वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वप्नभूतमिदं सर्वमचिन्तय़त भारत |
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
स्वप्नभूतांश्च ताँल्लोकान्पश्यन्तीहापि सुव्रताः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वप्नलव्धा यथा लाभा वितथाः प्रतिवोधने |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
स्वप्नस्तन्द्री च मोहश्च त्रय़स्ते तामसा गुणाः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
स्वप्ना हि वहवो घोरा दृश्यन्ते मधुसूदन |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वप्ना हि सुमहाघोरा दृष्टा मेऽनिष्टदर्शनाः |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वप्नान्ते जागरान्ते च तस्मात्प्रशममिच्छसि ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वप्नान्ते दर्शय़ामासुर्वाष्पकण्ठा युधिष्ठिरम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वप्नान्ते निशि राजेन्द्र दर्शय़ामास रश्मिवान् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
स्वप्नान्तेऽप्यथ चैवाह हरः सिन्धुपतेः सुतम् |
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
स्वप्नाय़मानास्त्वपरे परानिति विचेतसः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
५८
शकुनिरु उवाच
स्वप्ने न तानि पश्यन्ति जाग्रतो वा युधिष्ठिर |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
विदुर उवाच
स्वप्ने यथैतद्धि धनं जितं स्या; त्तदेवं मन्ये यस्य दीव्यत्यनीशः |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स्वप्ने सुप्तान्नय़न्तीं तां रात्रिष्वन्यासु मारिष |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
स्वप्ने हि रजसा देही तमसा चाभिभूय़ते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
स्वप्नेष्वपि भवत्येष विज्ञाता सुखदुःखय़ोः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
स्वप्नेऽप्येवं यथाभ्येति मनःसङ्कल्पजं रजः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वप्नो मे यदि वा दृष्टो यदि वा सत्यमेव तत् ||
७० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
स्वप्नोऽय़ं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
स्वप्नय़ोगे यथैवात्मा पञ्चेन्द्रिय़समागतः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वप्रभावाद्दुराधर्षो महावलपराक्रमः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
स्वप्स्यते जामदग्न्योऽसौ त्वद्वाणवलपीडितः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वप्स्यन्ति निहता वीरा भूमिमावृत्य पार्थिवाः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
स्वप्स्यन्ति निहताः कर्ण शतशोऽथ सहस्रशः ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
स्वप्स्ये वा निहतस्ताभ्यामसत्यो हि रणे जय़ः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वफलं तदुपाश्नाति कथं कर्ता स्विदीश्वरः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
स्वफेनपटसंवीता मत्तेव प्रमदाव्रजत् |
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
स्वभाग्यान्युपजीवन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स्वभाभिर्भासिता रम्या त्वय़ात्यर्थं विराजते ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९१
सूर्य उवाच
स्वभाव एष लोकानां विकारोऽन्य इति स्मृतः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
स्वभावं कारणं ज्ञात्वा न श्रेय़ः प्राप्नुवन्ति ते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
स्वभावं चेतनां चैव ज्ञात्वा वै देहमाश्रिते ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स्वभावकर्म च शुभं यत्र शूद्रेऽपि तिष्ठति |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
स्वभावगुणसम्पन्नो न जातु विनय़ान्वितः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
स्वभावगुप्तं नगरमापत्काले तु भारत |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
स्वभावजेन कौन्तेय़ निवद्धः स्वेन कर्मणा |
६० क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
स्वभावतः प्रवृत्तोऽन्यः प्राप्नोत्यर्थानकारणात् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वभावतस्तु निय़तौ भूतानां प्रभवाप्ययौ ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
स्वभावतस्ते प्रीय़न्ते नेतरः प्रीय़ते जनः ||
१४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
भीष्म उवाच
स्वभावतो हि संसिद्धा देवगन्धर्वदानवाः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
स्वभावनिरताः सर्वाः परितप्ये न केनचित् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
स्वभावनिहतानस्मान्न पुनर्हन्तुमर्हसि ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
स्वभावनिय़तं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
स्वभावप्रेरिताः सर्वे निविशन्ते गुणा यदा |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
स्वभावभाविनो भावान्सर्वानेवेह निश्चय़े |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
स्वभावमेष्यते तप्तं कृष्णाय़समिवोदके ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
स्वभावश्चैव कर्माणि दैवं येषां च कारणम् ||
८२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
स्वभावश्चैव नारीणां नराणामिह दूषणम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
स्वभावसिद्ध्या संसिद्धान्स नित्यं सृजते गुणान् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
स्वभावस्तु प्रय़ात्यग्रे प्रभवन्त्यशनान्यपि |
२० क