द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स्वरथं पृष्ठतः कृत्वा युद्धाय़ैव व्यवस्थितः ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
स्वरथं योजय़ित्वाशु निर्यात इति नः श्रुतम् ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
स्वरन्ध्रं पररन्ध्रं च स्वेषु चैव परेषु च |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
स्वरवर्णसमुच्चाराः सर्वांस्तान्विद्धि मत्कृतान् ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
स्वरविग्रहनाभीकं शोकसङ्घातवर्तनम् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
स्वरव्यञ्जनसंस्कारा भारती सत्यलक्षणा |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
स्वरव्यञ्जनय़ोः कृत्स्ना लोकवेदाश्रय़ेव वाक् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वरश्मिजालसंवीतं साय़ंसूर्यमिवानलम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
स्वरश्मिभिरिवादित्यो भुवने विसृजन्प्रभाम् ||
६४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
स्वरश्मिभिरिवान्योन्यं तापय़न्तौ शरोत्तमैः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
स्वरश्मीनभ्यवसृजेद्युगमादाय़ कालवित् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६७
शकुनिरु उवाच
स्वराज्यं प्रतिपत्तव्यमितरैरथ वेतरैः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
स्वराज्यमनुसम्प्राप्ता मोदिष्यन्ति सवान्धवाः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वराज्ये चावसत्प्रीतः प्रजा धर्मेण पालय़न् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वराज्ये पितृभिर्गुप्ते प्रीत्या समभिषेचय़त् ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय
८
सुदेष्णो उवाच
स्वरालपक्ष्मनय़ना विम्वोष्ठी तनुमध्यमा |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
स्वराष्ट्रं सम्परित्यज्य विद्रुताः सर्वतोदिशम् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वराष्ट्रपरराष्ट्रेषु ज्ञातव्यं वलमात्मनः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वराष्ट्राणि गमिष्यामस्तदनुज्ञातुमर्हसि ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
स्वराष्ट्रात्परराष्ट्राच्च कोशं सञ्जनय़ेन्नृपः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वराष्ट्रे विहरिष्यन्ति सुखं सुमनसस्तदा ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वराष्ट्रेषु च राजानः कच्चित्प्राप्स्यन्ति वै सुखम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
स्वरूपं च यदा द्रष्टुमिच्छेथास्त्वं नराधिप |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
स्वरूपं दिव्यमास्थाय़ तस्थौ तत्र महेश्वरः ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
स्वरूपं प्रतिलभ्याहमद्य वक्ष्यामि ते हितम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
स्वरूपतामात्मकृतं च विस्तरं; कुलान्वय़ं द्रव्यसमृद्धिसञ्चय़म् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
स्वरूपधारिणं नागं ददर्श च महीपतिः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
स्वरूपमालोचय़ते च रूपं; परं तथा वुद्धिपथं परैति ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
स्वरूपसदृशं चैव प्रादादङ्गविभूषणम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
स्वरूपिणं तु भर्तारं दृष्ट्वा भीमसुता तदा |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वरूपिणी ततो वुद्धिरुपतस्थे हरिं प्रभुम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वरूपिणी तदा राजन्दर्शय़ामास तं नृपम् ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
स्वरूपिणी तदाभ्येत्य स्नापय़ामास वारिणा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
भीष्म उवाच
स्वरूपिणीं शरीराद्धि तदा निष्क्रामतीं श्रिय़म् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वरेण पुष्टनादेन तुष्टाव मधुसूदनम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
स्वरेण मधुरेणाथ सान्त्वय़न्निव भारत ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
स्वरेण विप्रः शैक्षेण त्रीँल्लोकाननुनादय़न् |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
स्वरेणोच्चैः स शैक्षेण लोकानापूरय़न्निव ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
धर्म उवाच
स्वर्ग आरोह्यतां विप्र किं वा ते रोचतेऽनघ ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
स्वर्गं गच्छन्ति कल्याणि तन्मे कीर्तय़तः शृणु ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
स्वर्गं गच्छन्ति देवानामित्येषा वैदिकी श्रुतिः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं गच्छेत्यनुज्ञातस्त्र्यम्वकेन तदार्जुनः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं गन्तुं पराक्रान्तः स्वेन वीर्येण भारत ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
माण्डव्य उवाच
स्वर्गं चैवाक्षय़ं विप्र विदधामि तवोर्जितम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं जित्वा वीरलोकांश्च गत्वा; सिद्धिं प्राप्तः पुण्यकीर्तिर्महात्मा ||
३३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं त्रिविष्टपं प्राप्य तव पूर्वपितामहाः |
३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं त्रिविष्टपं प्राप्य धर्मराजो युधिष्ठिरः |
४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
स्वर्गं त्रिविष्टपं प्राप्य मम पूर्वपितामहाः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
स्वर्गं नय़ महाभागे मत्पितॄन्सगरात्मजान् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वर्गं परं पुण्यकृतां निवासं; क्रमेण सम्प्राप्स्यथ कर्मभिः स्वैः |
४१ क