द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
न सर्पय़क्षपतगा न मनुष्याः कथञ्चन ||
४७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
न सव्यसाची भीमो वा यमौ वा पुरुषर्षभौ |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
न सस्यघातो न च सङ्करक्रिय़ा; न चापि भूय़ः प्रकृतेर्विचारणा ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
न सहन्ते स्म देवानां समृद्धिं तामनुत्तमाम् ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
न सहेत विभुः साक्षाद्वज्रपाणिरपि स्वय़म् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
न सहेद्देवराजोऽपि तमस्मि मनसा गतः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
न सा प्रीतिर्दिविष्ठस्य सर्वकामानुपाश्नतः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
न सा शक्या तु सङ्ख्यातुं दक्षिणा दक्षिणावतः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
न सा शक्या मय़ा हातुमित्युक्त्वा स जगाम ह ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
न सा श्रीर्देवराजस्य यमस्य वरुणस्य वा |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा; न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
न सा स्त्रीत्यभिभाषा स्याद्यस्या भर्ता न तुष्यति |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
न साक्षिरात्मना समो नृणामिहास्ति कश्चन ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
न सादृश्ये तिष्ठति रूपमस्य; न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
न साधुना नोत असाधुना वा; समानमेतद्दृश्यते मानुषेषु |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
न साम दण्डोपनिषत्प्रशस्यते; न मार्दवं शत्रुषु यात्रिकं सदा |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
न साम्ना प्रतिपद्येत यदि गन्धर्वराडसौ |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
न साम्पराय़िकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
न सामय़जुऋग्वर्णाः क्रिय़ा नासीच्च मानवी |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
न सीदति स कृच्छ्रेषु न च दुर्गाण्यवाप्नुते ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
न सीदेतामदुःखार्हे मा गमो भरतर्षभ ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
न सुखं प्राप्य संहृष्येन्न दुःखं प्राप्य सञ्ज्वरेत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
न सुखे सुखकामाश्च देवदेवाः सनातनाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदिह युज्यते ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
न सुतैर्न च वित्तेन कर्मणा न च तत्फलम् |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
नीलकण्ठ उवाच
न सुपर्णास्तथा नागा न च विश्वे विय़ोनिजाः |
७६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न पन्नगाः |
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न राक्षसाः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
न सुष्वाप सुखं राजा हृदि शल्यैरिवार्पितैः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
न सूक्ष्ममपि मे किञ्चिद्व्यलीकमिह विद्यते ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
न सूची कपिशो नात्र न गवास्थिर्गजास्थिकः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
न सूतेषु न धुर्येषु न च शस्त्रोपनाय़िषु |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
७
विराट उवाच
न सूदतां मानद श्रद्दधामि ते; सहस्रनेत्रप्रतिमो हि दृश्यसे |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१०३
लोमश उवाच
न सेहिरे वेगवतां महात्मनां; वेगं तदा धारय़ितुं दिवौकसाम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
न सैनिकैश्च यातव्यं यास्यामो वय़मेव हि ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
न सोढुं समरे शक्यस्तं न वुध्यसि केशवम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
न सोमकाः प्रमोक्तव्या जीवितं परिरक्षता ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
न सोमदत्तो न शल्यो न कृपो युद्धमिच्छति |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न सोऽर्थमाप्नुय़ात्किञ्चित्फलान्यपि च भारत ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
न सौहृदवलैश्चापि नाकुलीनपरिग्रहैः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
न स्तम्भी न च मानी यो देवताद्विजपूजकः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
न स्तम्भी न च मानी यो न प्रमत्तो न विस्मितः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
न स्तेय़दोषं पश्यामि हरिष्याम्येतदामिषम् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न स्त्रिय़ं स्त्रीगुणोपेतां हन्युर्ह्येते मृषागताः ||
७२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
न स्त्री न वृद्धो न शिशुर्वासुदेवदिदृक्षय़ा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
मनुरु उवाच
न स्त्री पुमान्वापि नपुंसकं च; न सन्न चासत्सदसच्च तन्न |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
न स्त्रीणां विद्यते किञ्चिदन्यत्र पुरुषान्तरात् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
न स्त्रीभ्यः किञ्चिदन्यद्वै पापीय़स्तरमस्ति वै |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
न स्त्रीषु राजन्रतिमाप्नुवन्ति; न मागधैः स्तूय़माना न सूतैः ||
५३ ख