सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
स्वस्ति प्राप्नुत भद्रं वः स्वर्गे नः सङ्गमः पुनः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति प्राप्नुहि कौन्तेय़ काम्यकं पुनराश्रमम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
स्वस्ति प्राप्नुहि मैत्रेय़ गृहान्साधु व्रजाम्यहम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
स्वस्ति प्राप्नोतु भगवानित्युवाच कृताञ्जलिः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
स्वस्ति भूतेभ्य इत्युक्त्वा महास्त्रं समय़ोजय़म् |
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति वाच्यार्हतो विप्रान्दधिपात्रफलाक्षतैः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति वाच्यार्हतो विप्रान्प्रय़ाहि भरतर्षभ |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
स्वस्ति व्रजत भद्रं वो धारय़ध्वं परस्परम् ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६२
अर्जुन उवाच
स्वस्ति व्रजत भद्रं वो न भेतव्यं कथञ्चन |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
स्वस्तिकस्यालय़श्चात्र मणिनागस्य चोत्तमः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्तिकानक्षतान्भूमिं सुवर्णं रजतं मणीन् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
स्वस्तिकान्वर्धमानांश्च नन्द्यावर्तांश्च काञ्चनान् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ||
१०९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
स्वस्तिदः स्वस्तिभावश्च भागी भागकरो लघुः |
८१ क
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्तिमान्सहितः सर्वैर्भ्रातृभिः कुरुनन्दन |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
स्वस्तिय़ुक्तांश्च कल्यांश्च तन्मे प्रिय़मनुत्तमम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
स्वस्तीति चाथ तेनोक्ता सा स्त्री प्रत्यवदत्तदा |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः; स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
स्वस्त्यक्षय़ं भवतश्चास्तु नित्यं; वुद्ध्या सदा वुद्धिय़ुक्तं नमस्ते ||
८० ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्त्यस्तु कुशलं राजन्निति सर्वे व्यवस्थिताः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्त्यस्तु वः पथि सदा भूतेभ्यश्चैव सर्वशः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
स्वस्त्यस्तु समरे राजन्द्रोणाय़ेत्यव्रुवन्वचः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
स्वस्त्यस्त्वपादकेभ्यश्च नित्यं तव महारणे ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्त्यागमद्योऽतिरथस्तरस्वी; सोऽय़ं वने क्लिश्यति चीरवासाः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
स्वस्त्यात्रेय़ो महाजानुः कुशिकः शङ्खमेखलः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
स्वस्थः शक्तो मृदुर्दान्तो निर्विवित्सोऽनसूय़कः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
स्वस्थः सफलसङ्कल्पः सुखी विगतकल्मषः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
स्वस्थचित्तो वसेत्तत्र कृतकृत्य इवात्मवान् ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वस्थमासीनमव्यग्रं विनिद्रं राक्षसाधिपः |
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
स्वस्थस्यैते तूपदेशा भवन्ति; तस्मात्क्षुद्रं सर्पमेनं हनिष्ये ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वस्थानं प्रतिपद्यस्व शीघ्रमेव तमोनुद ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
स्वस्थानं प्रापितः ||
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
स्वस्थानमिष्टमिह व्राह्ममभीप्समानै; र्गङ्गा सदैवात्मवशैरुपास्या ||
९३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्थानस्थं महावाहो जहि शोकं नरर्षभ ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स्वस्थानात्स परिभ्रष्टो वर्णसङ्करतां गतः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
स्वस्थानान्न विकम्पेत स राजवसतिं वसेत् ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
स्वस्थो भव महावुद्धे पश्य मां शत्रुभिः सह |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
स्वस्थोऽव्यपेतः पश्यामि भूतानां प्रभवाप्ययौ ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
स्वस्थोऽस्मि वलवानस्मि दिदृक्षुः पितरावुभौ ||
१०७ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
स्वस्य वन्धोः शिरः कृष्ण गृहीत्वा पश्य तिष्ठति ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
स्वस्रीय़ं च हतं श्रुत्वा दुःखं स्वपिति केशवः |
११ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
स्वस्रीय़ं वासुदेवस्य पुत्रं गाण्डीवधन्वनः ||
१५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स्वस्रीय़ं वासुदेवस्य पुत्रं गाण्डीवधन्वनः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
स्वस्रीय़ाभ्यां नरव्याघ्रो नाकम्पत यथाचलः |
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स्वस्रीय़े वासुदेवस्य मम पुत्रेऽक्षिपञ्शरान् ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
स्वस्रीय़ो मातुलं चापि स्वस्रीय़ं चापि मातुलः ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्रीय़ो वासुदेवस्य पौत्रः पाण्डोर्महात्मनः ||
१०० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्रीय़ो वासुदेवस्य मृतो जात इति प्रभो ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
अर्जुन उवाच
स्वस्रीय़ो वासुदेवस्य साक्षाद्देवशिशुर्यथा |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
स्वस्रीय़ौ छादय़ां चक्रे शरौघैः पाण्डुनन्दनौ ||
४२ ख