भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
करैः शव्दं विमुञ्चद्भिः शीकरं च मुहुर्मुहुः |
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
करैरशास्त्रदृष्टैर्हि मोहात्सम्पीडय़न्प्रजाः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
करोति कदनं चैषां सङ्ग्रामे द्विषतां वली |
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
करोति कुर्वतः कर्म छाय़ेवानुविधीय़ते ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
करोति पाण्डवो व्यक्तं कर्मौपय़िकमात्मनः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
करोति पापं योऽज्ञानान्नात्मनो वेत्ति च क्षमम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
करोति पुण्यं तत्रापि जाग्रन्निव च पश्यति ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
करोति पुरुषः कर्म तत्र का परिदेवना ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
भीष्म उवाच
करोति यादृशं कर्म तादृशं प्रतिपद्यते ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
करोति येन भोगी स्यामिति तस्माद्विनश्यति ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
विश्वामित्र उवाच
करोतु भृतकोऽवर्षां राज्ञश्चास्तु पुरोहितः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
अर्वावसुरु उवाच
करोतु वै भवान्सत्रं वृहद्द्युम्नस्य धीमतः |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
करोतु स्वमभिप्राय़ं मास्य विघ्नकरो भव ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
करोतु स्वस्ति ते व्रह्मा स्वस्ति चापि द्विजातय़ः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
वृहस्पतिरु उवाच
करोत्यभीक्ष्णं संसृष्टमसंसृष्टश्च भाषते |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
करोत्यमलमात्मानं भास्करोपमदर्शनम् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
करोत्यसुकरं कर्म गजाश्वरथपत्तिषु ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
करोत्याहारमिति मां सर्वः परिजनः सदा |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
करोत्युपरमं काले तदाहुस्तामसं सुखम् ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
करोमि कर्म शुक्लं च तेन मामर्जुनं विदुः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
करोमि कामं कं तेऽद्य प्रवृणीष्व यमिच्छसि ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
स्कन्द उवाच
करोमि किं च ते शक्र शासनं तद्व्रवीहि मे ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
अर्जुन उवाच
करोमि तव साहाय़्यं शीघ्रमेव निहन्यताम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
करोमि यद्वो हितमद्य देवाः; स्वं चापि देहं त्वहमुत्सृजामि ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
करौ प्रच्छेदय़ामास धृतदण्डो जगाम सः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
कर्कराकर्करौ चोभौ कुण्डोदरमहोदरौ ||
१५ ग
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्करो वेणुजङ्घश्च कलापः कठ एव च ||
१५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
कर्कशाश्च विनीताश्च प्रभिन्नकरटामुखाः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
कर्कशैः प्रवरैर्योधैः कार्ष्णाय़सतनुच्छदैः ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
कर्काणां हेममालानां न च तेनाहमागतः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
कर्कोटकविषं तीक्ष्णं मुखात्सततमुद्वमन् ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कर्कोटकान्वीरकांश्च दुर्धर्मांश्च विवर्जय़ेत् ||
४५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
कर्कोटको वासुकिस्तक्षकश्च; पृथुश्रवा वरुणः कुञ्जरश्च |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्कोटकोऽथ शेषश्च वासुकिश्च भुजङ्गमः |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
कर्ण कर्ण महेष्वास कृप दुर्योधनेति च ||
३३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
कर्ण कर्ण महेष्वास रणेऽमितपराक्रम |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
कर्ण कर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्र वचः शृणु |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
कर्ण कर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्रात्मसंस्तुत |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
कर्ण जानामि ते वीर्यं सौहृदं च परं मय़ि |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
कर्ण दुर्योधनं पार्थः सभार्यं सममोचय़त् ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
अश्वत्थामो उवाच
कर्ण पश्य सुदुर्वुद्धे तिष्ठेदानीं नराधम |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्ण मद्वचनं तात शृणु सत्यभृतां वर |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
५५
अर्जुन उवाच
कर्ण यत्ते सभामध्ये वहु वाचा विकत्थितम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
कर्ण राजपुरं गत्वा काम्वोजा निहतास्त्वय़ा ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
कर्ण राजपुरं गत्वा त्वय़ैकेन धनुष्मता |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४३
कुन्त्यु उवाच
कर्ण शोभिष्यसे नूनं पञ्चभिर्भ्रातृभिर्वृतः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
अर्जुन उवाच
कर्णं कर्णानुगांश्चैव रणे हन्तास्मि पत्रिभिः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
कर्णं गच्छत भद्रं वः परीप्सन्तो वृकोदरात् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
कर्णं च तूर्णं विव्याध त्रिसप्तत्या शितैः शरैः ||
४८ ख