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शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
स्वय़ं पित्रा स्वरेणोच्चैस्त्रीँल्लोकाननुनाद्य वै ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं पीत्वा महाराज कालकूटं सुदुर्जरम् |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
स्वय़ं प्रगृह्यानय़ याज्ञसेनीं; किं ते करिष्यन्त्यवशाः सपत्नाः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
स्वय़ं प्रसह्यानय़ याज्ञसेनी; मपीह कच्चित्स हतस्त्वय़ाद्य ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
स्वय़ं प्रहर्तादाता च वश्यात्मा वश्यसाधनः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
श्रीरु उवाच
स्वय़ं प्राप्ते परिभवो भवतीति विनिश्चय़ः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ं प्राप्तेति मामेवं मावमंस्थाः पतिव्रताम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
स्वय़ं भागमुपाघ्राय़ पुरोडाशं गृहीतवान् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं भोजः कृतवर्मा कृतास्त्रो; व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
स्वय़ं मृत्पिण्डभूतस्य परतन्त्रस्य सर्वदा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
स्वय़ं मृत्युं रक्षमाणः पाञ्चाल्यं यः शिखण्डिनम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं यच्छन्हय़ान्राजन्व्यधमत्पाण्डवीं चमूम् ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं युद्धाय़ यद्राजा पार्थं यात्यसहाय़वान् ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं युधिष्ठिरो राजा व्यूहं वज्रमथाकरोत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
स्वय़ं यूपानुपादाय़ यजन्ते स्वाप्तदक्षिणैः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
स्वय़ं राजा रथोदारः पाण्डवः कुन्तिनन्दनः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
स्वय़ं राजा विषमस्थः परेषु; सामस्थ्यमन्विच्छति तन्न साधु |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
उत्तङ्क उवाच
स्वय़ं वापि भवान्पत्नीं किमर्थं नोपसर्पति ||
१७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ं विग्रहवान्धर्मो राजानं प्रसमीक्षितुम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
स्वय़ं विनाश्य पृथिवीं यज्ञार्थे द्विजसत्तम |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ं विभुरदीनात्मा तत्र ह्यभिविराजते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
स्वय़ं वृतेति सावित्री पित्रा वै प्रत्यपद्यत |
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं वैरं महत्कृत्वा पाञ्चालैः पाण्डवैः सह |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं वैरं महत्कृत्वा पाण्डवैः सहसृञ्जय़ैः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं वैरं महत्कृत्वा पुत्राणां वचने स्थितः |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ं व्रह्मत्वमकरोत्तस्य सत्यवतीसुतः |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
स्वय़ं शक्रेण कौरव्य निर्मितार्कसमप्रभा ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं शान्तनवो राजन्नभ्यधावद्धनञ्जय़म् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं सञ्चोदय़न्नश्वान्दन्तवर्णान्मनोजवान् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
स्वय़ं सन्दूषितामात्यः क्षिप्रमेव विनश्यति ||
६६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं समभिसन्धाय़ विजय़ाय़ेतराय़ वा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
स्वय़ं समुपजानन्हि पौरजानपदक्रिय़ाः |
१०४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
संवर्त उवाच
स्वय़ं सर्वान्कुरु मार्गान्सुरेन्द्र; जानात्वय़ं सर्वलोकश्च देव ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
स्वय़ं हि मृत्युर्विहितः सत्यसन्धेन संय़ुगे |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ंवर इवामर्दे प्रजह्रुरितरेतरम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ंवरं तु राजन्याः प्रशंसन्त्युपय़ान्ति च |
११ क
आदि पर्व
अध्याय २११
वासुदेव उवाच
स्वय़ंवरः क्षत्रिय़ाणां विवाहः पुरुषर्षभ |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ंवरः क्षत्रिय़ाणामितीय़ं प्रथिता श्रुतिः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ंवरमनाधृष्यं मन्यते चापि पाण्डवः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ंवराणां चान्येषां मा भूदेवंविधा गतिः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ंवरे महत्कर्म कृत्वा नसुकरं परैः ||
१०३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६२
द्रौपद्यु उवाच
स्वय़ंवरे यास्मि नृपैर्दृष्टा रङ्गे समागतैः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १७५
व्राह्मणा ऊचुः
स्वय़ंवरो महांस्तत्र भविता सुमहाधनः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
स्वय़ंय़ोनिस्तदा सूक्ष्मात्सूक्ष्ममाप्नोत्यनुत्तमम् ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वय़ङ्ग्राहा भविष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
स्वय़ज्ञं व्राह्मणा हित्वा क्षात्रं यज्ञमिहास्थिताः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ञ्जातः प्रणीतश्च परिक्रीतश्च यः सुतः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २७७
राजो उवाच
स्वय़मन्विच्छ भर्तारं गुणैः सदृशमात्मनः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
स्वय़मप्राशिता यश्च न स पापेन लिप्यते ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
स्वय़मभ्यद्रवद्भीमं नागानीकेन ते सुतः ||
३ ख