chevron_left  arrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
स तय़ाभिहतो धीमान्गदय़ा भीमवेगय़ा |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
स तय़ाभिहतो भीमश्चकम्पे च मुमोह च |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
स तय़ाभिहतो राजंस्तेन वाहुविमुक्तय़ा |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
स तय़ोः स्वागतं कृत्वा यथार्हं प्रतिपूज्य च |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
स तय़ोरपवर्गज्ञो वीतरागो विमुच्यते ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
स दंशितोऽभिनिर्याय़ त्वमद्य वलिनां वर |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
स दग्धो द्रोणकर्णाभ्यां दिव्यैरस्त्रैर्महारथः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
स दग्ध्वाक्षौहिणीं वाणैर्नैरृतान्रुरुचे भृशम् |
९८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
स दण्डकाष्ठमादाय़ वल्मीकमखनत्तदा |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
स दण्डधारस्तुरगांस्त्रिभिस्त्रिभि; स्ततो ननाद प्रजहास चासकृत् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८४
भृगुरु उवाच
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय़ गच्छति ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
स दत्त्वा सुकृतं तस्य क्षपय़ेत ह्यनर्चितः ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
स ददर्श गतासुं तं शय़ानं पीतशोणितम् |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
स ददर्श ततो भीमं दहन्तं रिपुवाहिनीम् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्श तदा कन्यां दाशानां देवरूपिणीम् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
स ददर्श तदा गृध्रं निहतं पर्वतोपमम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
स ददर्श तदा सीतां रावणाङ्कगतां स्नुषाम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
स ददर्श तदा हंसाञ्जातरूपपरिच्छदान् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
स ददर्श तदात्मानं सर्वसङ्गविनिःसृतम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
स ददर्श तदाभ्याशे मातरं ते शुभाननाम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
स ददर्श तमासीनं विपुलस्य कलेवरम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
स ददर्श द्विधा कृत्वा पर्वताग्रं शुकं गतम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ४१
सूत उवाच
स ददर्श पितृन्गर्ते लम्वमानानधोमुखान् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्श पुरीं रम्यां सिद्धचारणसेविताम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्श महाकाय़ं भुजङ्गं लोमहर्षणम् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्श महात्मानं विश्वरूपं महाभुजम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
स ददर्श महात्मानं शरतल्पगतं तदा |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्श महात्मानमुदकान्ते यशस्विनम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्श महावाहुर्वानराधिपतिं स्थितम् ||
६४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्श महावीर्यं देवदेवमुमापतिम् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
स ददर्श रणे कर्णं शय़ानं पुरुषर्षभम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्श शुभान्देशान्गिरेर्हिमवतस्तदा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
स ददर्श श्वमांसस्य कुतन्तीं विततां मुनिः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय २९७
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्श हतान्भ्रातॄँल्लोकपालानिव च्युतान् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्शाश्रमं दूराद्राजर्षेस्तस्य धीमतः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
स ददर्शाश्रमे पुण्ये पुष्पितद्रुमभूषिते |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
स ददाति मनुष्येभ्यः स एवाक्षिपते पुनः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
स ददाति मनुष्येभ्यः स चैवाक्षिपते पुनः ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
स दर्पपूर्णः कृपणः क्षिप्रमेव विनश्यसि ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
स दर्पपूर्णो न समीक्षसे त्व; मनर्थमात्मन्यपि वर्तमानम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
स दर्शय़ित्वा सैन्यानां स्ववाहुवलमात्मनः |
६० क
वन पर्व
अध्याय १२७
लोमश उवाच
स दष्टो व्यनदद्राजंस्तेन दुःखेन वालकः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
स दहेदग्निवद्दोषाञ्जय़ेल्लोकांश्च दुर्जय़ान् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
स दह्यमानो व्यथितः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् |
९४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
स दाता स च विक्रान्तो यो ददाति वसुन्धराम् ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
स दानवैः क्षततनुर्जामदग्न्यो द्विजोत्तमः |
१५१ क
वन पर्व
अध्याय २७८
नारद उवाच
स दान्तः स मृदुः शूरः स सत्यः स जितेन्द्रिय़ः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
स दास्यति मय़ा चोक्तो भवता चार्थितः स्वय़म् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ९०
युधिष्ठिर उवाच
स दास्यति यथाकालमुचिता यस्य या भृतिः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
स दिवःप्रस्थमासाद्य सेनाविन्दोः पुरं महत् |
१२ क