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शान्ति पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
स दृष्ट्वोपरि गच्छन्तं सेनापतिमुदारधीः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
स देव युक्तो रथसत्तमो नो; दुरावरो द्रावणः शात्रवाणाम् |
१०२ क
आदि पर्व
अध्याय ३६
सूत उवाच
स देवं परमीशानं सर्वभूतहिते रतम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
स देवं शरणं गत्वा विरूपाक्षमुमापतिम् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
स देवः सा गतिर्नान्या क्षत्रिय़स्य तथा द्विजाः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
स देवः सा गतिर्नान्या तथास्माकं द्विजातय़ः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
स देवः सा गतिर्नान्या तस्य का विप्रिय़ं चरेत् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
स देवगन्धर्वमनुष्यपूजितं; निहत्य कर्णं रिपुमाहवेऽर्जुनः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
स देवचरितानीह कथय़ामास मे सदा ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
स देवदत्तं सहसा विनाद्य; विदार्य वीरो द्विषतां मनांसि |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
स देवदत्तमादाय़ शङ्खं हेमपरिष्कृतम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
स देवपितृगन्धर्वैः कुरूणां कीर्तिवर्धनः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
स देवराजसदृशो धर्मज्ञः सत्यवागृजुः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
स देवलोकं सम्प्राप्य नन्दने सुसुखं वसेत् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
स देवलोके विहरत्यभीक्ष्णं; ततश्च्युतो मानुषतामुपैति |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
स देवशत्रूनिव देवराजः; किरीटमाली व्यधमत्समन्तात् |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
स देवस्तपसा चैव वीर्येण च समन्वितः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
स देवानां मानुषाणां पितॄणां; तमेवाहुर्यज्ञविदां वितानम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
स देवेन्द्रश्च वाय़ुश्च सोऽश्विनौ स च विद्युतः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
स देवैर्याचितोऽस्थीनि यत्नादृषिवरस्तदा |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
स देवोऽस्मद्वरात्प्रीतो व्रह्मलोकं हि नेष्यति ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
स देव्या दर्शितः साक्षात्प्रीतास्मीति तदा किल |
७ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
स देव्या समनुज्ञातो गोसहस्रफलं लभेत् ||
७९ ग
स्त्री पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
स देशः क्व नु यत्रासौ वसते धर्मसङ्कटे |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
स देशः परराष्ट्राणि प्रतिगृह्याभिवर्धितः |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
स देशः शोभितो राजन्दीपवृक्षैश्च सर्वशः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
स देशान्विविधान्पश्यंश्चीनहूणनिषेवितान् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
स देशो यत्र नस्तप्तं तपः परमदारुणम् |
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
स देशो यत्र वर्ताम गुहेव समपद्यत ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
स देही विमलः श्रीमाञ्शुद्धो विद्यासमन्वितः ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
स दैवं वलवन्मत्वा भवितव्यं च पार्थिवः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ३४
सूत उवाच
स दैवमेवाश्रय़ते नान्यत्तत्र पराय़णम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
स द्रोणं दशभिर्वाणैः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे |
६४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
स द्रोणं निशितैर्वाणै राजन्विव्याध सप्तभिः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
स द्रोणं पञ्चभिर्विद्ध्वा शरैः संनतपर्वभिः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
स द्रोणभीष्मावाय़ान्तौ सहेदिति मतिर्मम |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
स द्रोणमभिवाद्याथ कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
स द्रोणमेघः शरवर्षवेगैः; प्राच्छादय़न्मेघ इवार्करश्मीन् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
स द्रौणिमिषुणैकेन विद्ध्वा शल्यं च पञ्चभिः |
८ क
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
स द्वादशाहं जलवाय़ुभक्षः; कुर्वन्क्षपाहःसु तदाभिषेकम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
स द्वारकां परित्यज्य क्रूरो वृष्णिभिरर्दितः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
स द्विजो वैश्यतामेति वैश्यो वा शूद्रतामिय़ात् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
स द्वीपी व्याघ्रतां नीतो रिपुभिर्वलवत्तरः |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
स धनञ्जय़ निर्द्वन्द्वो मुनिर्ज्ञानसमन्वितः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
स धनुः सूतपुत्रस्य छित्त्वा ज्यां च सुसंशितः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
स धनुर्जैत्रमादाय़ घोरं जलदनिस्वनम् |
११३ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
स धन्वी वद्धतूणीरः खड्गगोधाङ्गुलित्रवान् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
स धर्मकुशलो राजा मोक्षशास्त्रविशारदः |
११ क
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
स धर्मपाशेन सितोग्रतेजा; ध्रुवं विनिःश्वस्य सहत्यमर्षम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
स धर्ममाहूय़ पुरा महर्षिरिदमुक्तवान् |
७८ क