कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
स नीललोहितो धूम्रः कृत्तिवासा भय़ङ्करः |
८७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स नूनं वहुभिर्यत्तैर्युध्यमानो नरर्षभैः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
स नूनं विरथं दृष्ट्वा कर्णं भीमेन निर्जितम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
स नूनमृषभस्कन्धं दृष्ट्वा कर्णं निपातितम् |
८६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
स नृत्यन्निव नागेन्द्रो वज्रदत्तप्रचोदितः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स नृत्यन्वै रथोपस्थे दर्शय़न्पाणिलाघवम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
स नृपतिरभवत्सदैव ताभ्यः; प्रय़तमना ह्यभिसंस्तुवंश्च गा वै |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
स नृपो राज्यसहितं पुत्रं चास्मै न्यवेदय़त् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
स नेच्छति धनं भ्रात्रा सहैकस्थं महामुनिः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
स नेह सुखमाप्नोति कुत एव परत्र वै ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
स नो गुप्तः सुखाय़ स्याद्धन्यात्पार्थांश्च संय़ुगे ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
स नो जय़स्य दाता च मन्त्रस्य च धृतव्रतः |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
स नो दास्यति यं मन्त्रं तेन योत्स्यामहे परान् ||
५२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
स नो दास्यति सुप्रीतो धनानि वहुलान्युत |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
स नो दिव्यास्त्रसम्पन्नश्चक्षुर्विषय़मागतः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२०४
वैशम्पाय़न उवाच
स नो द्वादश वर्षाणि व्रह्मचारी वने वसेत् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
स नो मन्ये ध्वजान्दृष्ट्वा भीत एष पलाय़ति |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
स नो मान्यश्च पूज्यश्च सर्वथा मधुसूदनः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
स नो रक्ष्यतमस्तात क्रुद्धाद्भीतो धनञ्जय़ात् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
स नो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो; न्यपातय़द्व्यसने राज्यमिच्छन् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
स नो वहुमतान्राजा वुद्ध्वा वुद्धिमतां वरः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
स नोऽपृच्छद्दुःखमूलमुक्तवत्यो वय़ं च तत् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स न्यवर्तत तं भीमो वार्यमाणः शितैः शरैः ||
४७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन जलमर्णवे |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
स पक्षिसङ्घाचरितमाकाशं पूरय़ञ्शरैः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
स पञ्चदश नाराचाञ्श्वसतः पन्नगानिव |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स पञ्चधा पञ्चजनोपपन्नं; सञ्चोदय़न्विश्वमिदं सिसृक्षुः |
३८ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स पञ्चनदमासाद्य धीमानतिसमृद्धिमत् |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
स पञ्चभिर्भवेद्युक्तः पातकैः सोपपातकैः |
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
स पतञ्शुशुभे नागो धनञ्जय़शराहतः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
स पत्न्या वचनं श्रुत्वा धर्मय़ुक्तिसमन्वितम् |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
स पथः प्रच्युतो धर्म्यात्कुपथं प्रतिपद्यते ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
स पथः प्रच्युतो धर्म्याद्विपदं प्रतिपद्यते ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स पथि गच्छन्नपश्यदृषभमतिप्रमाणं तमधिरूढं च पुरुषमतिप्रमाणमेव ||
१०१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
स पन्थाः प्रवभौ राजन्सर्वस्यैव सुखावहः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
स पन्थानमथासाद्य समुद्राभिसरं तदा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
भीष्म उवाच
स पन्नगपतिस्तत्र प्रय़यौ व्राह्मणं प्रति |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
स पपात क्षितौ क्षीणः प्रविद्धाभरणाम्वरः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स पपात गजस्कन्धात्प्रमुक्ताङ्कुशतोमरः ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
स पपात ततो भूमौ रक्षोवलसमाहतः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
स पपात ततो वाहात्स्वलोहितपरिस्रवः |
१०५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
स पपात तदा राजंस्तोमरेण समाहतः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
स पपात द्विधा छिन्न आय़सः परिघो महान् |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
स पपात नरव्याघ्रो वसुधामनुनादय़न् |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
स पपात महावाहुर्वज्राहत इवाचलः ||
२१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स पपात महावाहुर्वसुधामनुनादय़न् |
८४ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
स पपात महावीर्यो दिव्यास्त्राभिहतो रणे |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
स पपात रथात्तूर्णं भारद्वाजशराहतः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
स पपात रथाद्भूमौ गतसत्त्वोऽल्पचेतनः ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
स पपात रथाद्राजन्भूमौ तूर्णं ममार च ||
९ ग