विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
स एष पार्थो विक्रान्तः सव्यसाची परन्तपः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८७
मार्कण्डेय़ उवाच
स एष पुरुषव्याघ्र सम्वन्धी ते जनार्दनः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
स एष प्रकृतिष्ठो हि तस्थुरित्यभिधीय़ते ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
स एष भगवान्देवः सर्वकृत्सर्वतोमुखः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
स एष भगवान्देवः सर्वतत्त्वादिरव्ययः |
१८२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
स एष भगवान्देवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
स एष भगवान्विष्णुः समुद्रे तप्यते तपः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
स एष भीष्मः कुरुवंशकेतु; र्येनाहृतास्त्रिंशतो वाजिमेधाः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
स एष रथशार्दूलस्तद्वैरं संस्मरन्रणे |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
स एष राजन्वश्यस्ते पाण्डवः प्रेष्यवत्स्थितः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
स एष राजा जनकः सर्वं धर्मेण पश्यति |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
स एष रुद्रभक्तश्च केशवो रुद्रसम्भवः |
८९ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
स एष वैश्वानरतुल्यतेजाः; कुन्तीसुतः शत्रुसहः प्रमाथी ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
स एष शाश्वतो देवः सर्वगुह्यमय़ः शिवः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
स एष शूरो नित्यममर्षणश्च; धीमान्प्राज्ञः सहदेवः पतिर्मे |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
स एष श्रूय़ते शव्दो गाण्डीवस्यामितौजसः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
स एष सर्वासुरमर्त्यलोकं; समुद्रकक्ष्यान्तरिताः पुरीश्च |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
वसिष्ठ उवाच
स एषोऽस्मिन्वनोद्देशे निवसत्यतिभीषणः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
स और्व इति विप्रर्षिरूरुं भित्त्वा व्यजाय़त ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
स कक्षेऽग्निरिवोत्सृष्टो निर्दहंस्तरसा रिपून् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
स कण्टकविभुग्नाङ्गो लोहितार्द्रीकृतच्छविः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
स कथं काञ्चनष्ठीवी सृञ्जय़स्य सुतोऽभवत् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
स कथं कौरवे वंशे प्रशंसञ्जन्म चात्मनः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
धृतराष्ट्र उवाच
स कथं कौरवेय़ेण समरेष्वनिवारितः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
स कथं तारकः प्राप्तो निधनं तद्व्रवीहि मे ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स कथं त्वय़ि राजेन्द्र कृपां वै न करिष्यति ||
४१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
स कथं दुर्मुखोऽमित्रैर्हतो विवुधलोकजित् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
स कथं नरमात्रेण शक्यो ज्ञातुं सतां गतिः ||
७ घ
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
स कथं निहतः पार्थैः क्षुद्रमत्स्यैर्यथा तिमिः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
स कथं निहतः शेते वातरुग्ण इव द्रुमः ||
३१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
स कथं निहतोऽमित्रैः पांसून्ग्रसति मे सुतः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
स कथं पाण्डवं युद्धे नातरत्सञ्जय़ौजसा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
धृतराष्ट्र उवाच
स कथं पाण्डवं युद्धे भ्राजमानमिव श्रिय़ा |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
स कथं पाण्डवान्युद्धे जेष्यते तात सङ्गतान् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
स कथं पाण्डवेय़ेभ्यो भय़ं पश्यसि सैन्धव ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
स कथं पृथिवीमेतां प्रददासि विशां पते |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
स कथं भीमकर्माणं भीमसेनमय़ुध्यत ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
स कथं भ्रातरं ज्येष्ठं राजानं धर्मकोविदम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
स कथं मद्धिते यत्नं प्रकरिष्यति याचितः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
स कथं मन्दविज्ञानो ग्रन्थं वक्ष्यति निर्णय़ात् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
स कथं मम वाक्यानि श्रद्दध्याद्भूय़ एव तु ||
७ ग
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
स कथं मानुषैर्देवं यष्टुमिच्छसि शङ्करम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
स कथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णः पार्थेन संय़ुगे |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
स कथं वदसे शत्रुं युध्यस्व गदय़ेति ह |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
स कथं व्राह्मणो वृद्धः शस्त्रेण वधमाप्तवान् ||
२९ ग
आदि पर्व
अध्याय
१३०
वैशम्पाय़न उवाच
स कथं शक्यमस्माभिरपक्रष्टुं वलादितः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स कथं सर्वधर्मज्ञः सर्वागमविशारदः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
स कथञ्चित्ततस्तस्मात्सार्थान्मुक्तो द्विजस्तदा |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
स कथाः कथय़न्नेव निद्रय़ा जनमेजय़ |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
स कदाचित्क्षुधाविष्टो मृगय़न्भक्षमात्मनः |
८ क