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शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
स पूज्यमानो देवैश्च गन्धर्वैरृषिभिस्तथा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
स पूजय़ित्वा मधुहा यथाव; त्पार्थांश्च कृष्णां च पुरोहितं च |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
स पूतिना विस्रवता वेदनार्तो महामुनिः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
स पूर्वं पितरं श्रुत्वा हतं युद्धे त्वय़ानघ |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
स पूर्वदेवचरितं तत्र तत्र विशां पते |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
स पूर्वदेवो निजघान दैत्या; न्स पूर्वदेवश्च वभूव सम्राट् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
स पूर्वमतिविद्धश्च भृशं पश्चाच्च पीडितः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
स पूर्वमुक्त्वा वेदार्थान्भारतार्थांश्च तत्त्ववित् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
स पूर्वसन्ध्यां व्रह्माणं वन्दितुं याति सर्वदा |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
स पूर्वानात्मनः सप्त कुले हन्यात्तथा परान् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
स पृष्टः कुशलं तेन सम्पूज्य मधुसूदनम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
स पृष्टः कौशिकः सत्यं वचनं तानुवाच ह |
४५ क
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
स पृष्टः पाण्डुपुत्रेण प्रीय़माणो महामनाः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
स पौरवं रथशक्त्या निहत्य; छित्त्वा रथं तिलशश्चापि वाणैः |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
स पौरवरथस्येषामाप्लुत्य सहसा नदन् |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
स पौराणीं व्रह्मगुहां प्रविष्टो; महीसत्रं भारताग्रे ददर्श |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स पौष्यं पुनरुवाच |
१११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
स प्रकृत्या च वै भीरुः किल्विषी च नराधिपः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
स प्रजापतिरेवाहं चेतनात्सर्वलोककृत् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
स प्रजाभिः परित्यक्तश्चकार कुशलं महत् |
५ क
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
स प्रजार्थे परं यत्नमकरोत्सुसमाहितः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रतस्थे महावाहुर्धौम्येन सहितो नृपः ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
स प्रतोदं पुनर्गृह्य रश्मींश्चैव महाय़शाः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
स प्रत्यक्षं देवेभ्यो भागमददत्परोक्षमसुरेभ्यः ||
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
स प्रदध्यौ तदा राजन्नग्नावग्निरिवाहितः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ११७
अकृतव्रण उवाच
स प्रदाय़ महीं तस्मै कश्यपाय़ महात्मने |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
स प्रभुः सर्वभूतानां विभुश्च भरतर्षभ |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय ४
विदुर उवाच
स प्रमोक्षाय़ लभते पन्थानं मनुजाधिप ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रविश्य गृहं राजा कृतपूर्वाह्णिकक्रिय़ः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रविश्य पुरं राज्ञो नृपवेश्माभ्ययात्ततः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
स प्रविश्य पुरीं दीनो नाभ्यभाषत किञ्चन |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
स प्रविश्य महावाहुरुद्देशज्ञश्च तस्य ह |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रविश्य यथान्याय़ं पाण्डवानां निवेशनम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रविश्य सभां वीरः सिंहो गिरिगुहामिव |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
स प्रविश्याकरोद्भूमिं कवन्धगणसङ्कुलाम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २५१
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रविश्याश्रमं शून्यं सिंहगोष्ठं वृको यथा |
८ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रविश्याश्रमपदं व्यपविद्धवृसीघटम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
स प्रवृत्तिनिवृत्त्यर्थं धर्माणां क्षत्रमिच्छति ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रवेशाय़ चाशक्तो गमनाय़ च पाण्डवः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
स प्रसिक्तमना भोगान्विसृज्य पितृसञ्चितान् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
स प्रसिक्तमना भोगान्विसृज्य पितृसञ्चितान् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
स प्रसेनजितं राजन्नधिगम्य नराधिपम् |
२ क
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रस्थितः केशवेनानुशिष्टो; मदातुरो ज्ञातिवधार्दितश्च |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
स प्रहस्य विशुद्धात्मा शक्तिं प्रज्वलितां तदा |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
स प्राञ्जलिर्विनतेनाननेन; प्रवेपमानः सहसैवमुक्तः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
स प्राप्नोति महाभागः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ||
१०४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
स प्राप्य चाश्रमपदं दिवोदासात्मजोऽव्रवीत् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
स प्राप्य तादृशीं वृत्तिं सत्कृतः सततं परैः |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
स प्राप्य राजानममित्रतापन; स्ततोऽव्रवीन्मेघमहौघनिःस्वनः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
स प्राय़ात्पाण्डवैरुक्तस्तत्पुरं सात्वतां वरः |
४० क