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शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
स प्रेत्य लभते लोकानक्षय़ानिति शुश्रुम ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५८
भीष्म उवाच
स प्रेत्य लभते स्वर्गमिह चानन्त्यमश्नुते ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रय़ातो महावाहुः समेषु मरुधन्वसु |
७ क
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
स प्रय़ाहि महाराज श्रिय़ा परमय़ा युतः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
स पय़ोष्ण्यां नरश्रेष्ठः स्नात्वा वै भ्रातृभिः सह |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
स फलं सर्वपुण्यानां प्रेत्य चानुभविष्यति ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
स भक्तो मागधं राजा भीष्मकः परवीरहा ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
स भक्ष्यमाणस्त्राणार्थी पितामहमुपाद्रवत् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
स भक्षय़िष्यन्सङ्क्रुद्धः शतक्रतुमुपाद्रवत् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
स भग्नमाय़ो हैडिम्वः कर्णं वैकर्तनं ततः |
१०६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
स भग्नहय़चक्राक्षो विशीर्णध्वजकूवरः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
स भवः स च पर्जन्यो महादेवः स चानघः |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
स भवांस्तारय़त्वस्माद्दुःखामर्षमहार्णवात् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
स भवांस्त्रातु नो द्रोणात्सत्याज्ज्याय़ोऽनृतं भवेत् |
९९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
स भवानत्र यात्वाशु यत्र कर्णो महारथः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २४
सुद्युम्न उवाच
स भवानभ्यनुज्ञातः शुचिकर्मा महाव्रतः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
द्रौणिरु उवाच
स भवानस्तु नः शूरः प्रणेता वाहिनीमुखे |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
स भवानीदृशं मित्रं मन्यते च यथा भवान् |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
स भवानेतु गच्छाव नय़िष्ये त्वां यथासुखम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ११५
युधिष्ठिर उवाच
स भवान्कथय़त्वेतद्यथा रामेण निर्जिताः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
स भवान्कुरुमध्ये तं सान्त्वपूर्वं भय़ान्वितम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
स भवान्कृतवुद्धीनां प्रधान इति मे मतिः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
स भवान्क्षत्रिय़गुणैर्युक्तः सर्वैः कुलोद्वहः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
स भवान्गमनादेव साधय़िष्यत्यसंशय़म् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
स भवान्दृष्टिमाञ्शक्तः पश्यन्नात्मनि पौरुषम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
स भवान्देववत्प्राज्ञो ज्ञात्वा भवमय़ं जगत् |
८३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
स भवान्धर्मपुत्रेण शमं कर्तुमिहार्हति |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
स भवान्धर्मभीरुत्वाद्ध्रुवमैष्यन्महत्तमः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
स भवान्धर्मय़ुक्तश्च धर्म्यं तेषु समाचरन् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
स भवान्धुर्यवत्सङ्ख्ये धुरमुद्वोढुमर्हसि |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १३०
दुर्योधन उवाच
स भवान्पाण्डवानाशु विवासय़ितुमर्हति |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
स भवान्पाण्डुपुत्राणामाज्ञापय़तु माचिरम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
स भवान्पातु नः सर्वान्विवुधानिव वासवः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
स भवान्पुष्ययोगेन मुहूर्तेन जय़ेन च |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
स भवान्प्रतिगृह्णातु ममेमां माधवीं सुताम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
स भवान्प्रतिय़ात्वद्य पाण्डवानेव माचिरम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
स भवान्प्रसमीक्ष्यैतन्नेदृशं वक्तुमर्हति ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५
वासुदेव उवाच
स भवान्प्रेषय़त्वद्य पाण्डवार्थकरं वचः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
स भवान्मज्जमानानां वन्धूनां त्वं प्लवो यथा |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
स भवान्मर्षय़त्येनांस्त्वत्तो भीतान्विशेषतः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
स भवान्मातृपितृवदस्मासु प्रतिपद्यताम् |
४५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
स भवान्मित्रतामद्य सम्प्राप्तो मम पार्थिव |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
स भवान्मोक्षय़त्वस्मान्यत्नेनास्माद्धुताशनात् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
स भवान्मय़ि निक्षेपो निक्षिप्तः सव्यसाचिना |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ९०
लोमश उवाच
स भवान्यत्परं वेद पावनं पुरुषान्प्रति |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
स भवान्यातु कर्णेन द्वैरथं युध्यतां निशि |
५५ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
स भवान्रथमास्थाय़ सर्वोपकरणान्वितम् |
८० क
आदि पर्व
अध्याय ५६
जनमेजय़ उवाच
स भवान्विस्तरेणेमां पुनराख्यातुमर्हति |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५
दुर्योधन उवाच
स भवान्वीक्ष्य सर्वेषु मामकेषु महात्मसु |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
स भवान्सर्वधर्मज्ञः सर्वात्मा भरतर्षभ |
८ क