आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
होतारमपि हव्यं च विद्धि मां भृगुनन्दन |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
होतारो वृषलानां च वृषलाध्यापकास्तथा |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
होतॄणां साधनं चैव शृणु सर्वमशेषतः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
होमकाले तथा जुह्वन्नृतुकाले तथा व्रजन् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
होमकाले यथा वह्निः कालमेव प्रतीक्षते |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
होमधेनुस्तमागाच्च स्वय़ं चापि दुदोह ताम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
होमधेन्वा वत्समस्य प्रमत्त इषुणाहनम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
होमवेलां कुरुश्रेष्ठ सम्प्रज्वलितपावकाम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२०
स्कन्द उवाच
होष्यन्त्यग्नौ सदा देवि स्वाहेत्युक्त्वा समुद्यतम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
ह्यस्तनेनैव कोपेन शक्तिं वै प्राहिणोन्मय़ि ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ह्रदं चैवाहमाचष्ट यं प्रविष्टो नराधिपः ||
५७ ग
शल्य पर्व
अध्याय
५३
नारद उवाच
ह्रदं द्वैपाय़नं नाम विवेश भृशदुःखितः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
ह्रदः कृतः क्षीरनिधिः पवित्रं परमुत्तमम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
ह्रदः परमदुष्प्रापो मानुषैरकृतात्मभिः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
ह्रदप्रवेशनं पर्व गदाय़ुद्धमतः परम् ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
ह्रदश्च कुशवानेष यत्र पद्मं कुशेशय़म् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
ह्रदांश्च सरितश्चैव सागरांश्च तथैव ह ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
ह्रदाः कूपाश्च रुधिरमुद्वेमुर्नृपसत्तम |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ह्रदादाहूय़ योगेन भीमसेनेन पातितः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
ह्रदानामुदधिः श्रेष्ठः पर्जन्यो वर्षतां वरः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
ह्रदानामुदधिः श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम् |
२०२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ह्रदाश्च तव तीर्थत्वं गमिष्यन्ति न संशय़ः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ह्रदाश्च तीर्थभूता मे भवेय़ुर्भुवि विश्रुताः ||
२७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
ह्रदाश्च सरितश्चैव चुक्षुभुः सागरास्तथा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८७
धौम्य उवाच
ह्रदिनी पुण्यतीर्था च राजर्षेस्तत्र वै सरित् |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
ह्रदिनीं वप्रसम्पन्नां महानूपां महावनाम् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
ह्रदे द्वैपाय़ने चापि सलिलस्थं ददर्श तम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ह्रदेष्वेतेषु यः स्नात्वा पितॄन्सन्तर्पय़िष्यति |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
ह्रदैरिव प्रक्षुभितैर्हतनागै रथोत्तमैः ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ह्रदोदरं निखर्वैश्च वृतं दशभिरीश्वरः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
ह्रसन्ति च मनुष्याणां स्वरवर्णमनांस्युत |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
ह्रस्वं दीर्घं तथा स्थूलं चतुरस्राणु वृत्तकम् ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
ह्रस्वकः कृष्णनय़नस्ताम्रो वर्णेन शौनक ||
२९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ह्रस्वग्रीवा महाकर्णा नानाव्यालविभूषिताः ||
८३ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
ह्रस्वमासाद्य सञ्चारं नासौ विनमते क्वचित् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
ह्रस्वेन चैते आमुक्ते भवतो ह्रस्वके तदा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
ह्रस्वो दीर्घस्तथा स्थूलश्चतुरस्रोऽणु वृत्तवान् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
ह्रस्वोऽतिमात्ररक्ताक्षो हरिश्मश्रुर्विभीषणः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
ह्रस्वोऽल्पकाय़ः फलितो विवृद्धो; यश्चाफलस्तस्य न वृद्धभावः ||
९ ख
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
ह्रादः क्राथः शितिकण्ठोऽग्रतेजा; स्तथा नागौ चक्रमन्दातिषण्डौ |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
ह्रादिन्य इव मेघेभ्यः शल्यस्य न्यपतञ्शराः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ह्रादेन गजघण्टानां शङ्खानां निनदेन च |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ह्रादेन गजघण्टानां शङ्खानां निनदेन च |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
ह्रादेन गजघण्टानां शङ्खानां निनदेन च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
ह्रासं वृद्धिं विनाशं च न प्रहृष्ये न च व्यथे ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
ह्रिय़ते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
ह्रिय़ते ते गृहादन्नं संस्कृतं सार्वकामिकम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
ह्रिय़ते रुक्मपात्रीभिर्यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
ह्रिय़ते वुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रिय़ैः |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
राजपुत्र उवाच
ह्रिय़ते सर्वमेवेदं कालेन महता द्विज ||
२५ ख