विराट पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
वुद्ध्या तुल्यो ह्युशनसा वृहस्पतिसमो नय़े |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
वुद्ध्या त्वमुशनाः साक्षाद्वले त्वधिकृता वय़म् |
१२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
वुद्ध्या दाक्ष्येण चाप्यन्ये चिन्वन्ति धनसञ्चय़ान् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
वुद्ध्या निवर्तते दोषो यत्नेनाभ्यासजेन वै ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
वुद्ध्या प्रपश्य कौन्तेय़ कथं कृष्णा गमिष्यति ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्ध्या प्रवक्तुं न द्रोहात्प्रवक्ष्यामि निवोध तत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
वुद्ध्या भक्त्या चोत्तमश्रद्धय़ा च; ततस्तेऽहं दद्मि वरं यथेष्टम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
वुद्ध्या भवति संय़ुक्तो माहात्म्यं चाधिगच्छति ||
१३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
वुद्ध्या भय़ं प्रणुदति तपसा विन्दते महत् |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
वुद्ध्या युक्तो यय़ा पार्थ कर्मवन्धं प्रहास्यसि ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्ध्या विचिन्तय़ामास वीराः केन निपातिताः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
वुद्ध्या विनय़सम्पन्ना सर्वज्ञानविशारदा |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
वुद्ध्या विशुद्धय़ा युक्तो धृत्यात्मानं निय़म्य च |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
वुद्ध्या विशुद्धय़ा युक्तो यः कुरूंस्तारय़ेद्भय़ात् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
वुद्ध्या वीर्येण संय़ुक्तः श्रुतेनाभिजनेन च ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
वुद्ध्या वुध्येदिहार्थे न तदह्ना तु निकृष्टय़ा ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६७
सभासद ऊचुः
वुद्ध्या वोध्यं न वुध्यन्ते स्वय़ं च भरतर्षभाः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
वुद्ध्या समो यस्य नरो न विद्यते; वक्ता तथा सत्सु विनिश्चय़ज्ञः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्ध्या सुप्रतिपन्नेषु कुर्यात्साधुपरिग्रहम् |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्ध्या ह्यगणय़त्प्राज्ञो मृत्योर्भीतो ह्यसोमपः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
वुद्ध्या ह्यनिगृहीतेन मनसा कर्म तामसम् |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
वुद्ध्यात्मके व्यस्तमस्तीति तुष्टो; मोहादेकत्वं यथा चर्म चक्षुः |
७६ क
वन पर्व
अध्याय
२५०
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्ध्याभिजानामि नरेन्द्रपुत्र; न मादृशी त्वामभिभाष्टुमर्हा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
वुद्ध्याववुध्येदात्मानं न चावुद्धिषु विश्वसेत् ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३३
व्राह्मण उवाच
वुद्ध्याय़ं गम्यते मार्गः शरीरेण न गम्यते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
शुक उवाच
वुद्ध्यैश्वर्याभिसर्गार्थं यद्ध्यानं चात्मनः शुभम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्ध्वा च तत्त्वतो देवी शर्मिष्ठामिदमव्रवीत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
वुद्ध्वा च स महातेजा न चचालैव जाजलिः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
वुद्ध्वा तय़ोर्वलं वुद्धिं कनीय़ांसमुपह्वरे |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
वुद्ध्वा यदिह संसिद्धा भवन्तीह मनीषिणः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्वुदा इव तोय़ेषु भवन्ति न भवन्ति च ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
वुधः सम्पततेऽभीक्ष्णं जनय़न्सुमहद्भय़म् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
वुधस्यासीन्महेन्द्राभः पुत्र एकः पुरूरवाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
वुधा येन प्रशंसन्ति मोक्षं सुखमनुत्तमम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
वुधा विधिविधानज्ञास्तदा युक्तं प्रचक्षते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
वुधाश्च निर्वाणपरा वदन्ति; तस्मान्न कुर्यात्प्रिय़मप्रिय़ं च ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
वुध्यते च परां वुद्धिं विशुद्धाममलां यदा |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
वुध्यते यदि वाव्यक्तमेतद्वै पञ्चविंशकम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
वुध्यमानं च वुद्धं च प्राहुर्योगनिदर्शनम् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
वुध्यमानं प्रवुध्यन्ति गमय़न्ति समं तदा ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
वुध्यमानं महाप्राज्ञमवुद्धपरिवर्जनात् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
वुध्यमानस्य दर्पो वा मानो वा किं करिष्यति ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
वुध्यमानाप्रवुद्धाभ्यां पृथक्पृथगरिन्दम ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
वुध्यमानो भवत्येष सङ्गात्मक इति श्रुतिः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
वुध्यमानो यथापूर्वमखिलेनेह भारत ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
वुध्यमानो यदात्मानमन्योऽहमिति मन्यते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
वुध्यमानोऽप्रवुद्धेन समतां याति मैथिल |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
वुध्यामि त्वां वृत्रहणं शतक्रतुं; व्यतिक्रमन्तं भुवनानि विश्वा |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
वुभुक्षवः शुचिकामा हि देवा; नाश्रद्दधानाद्धि हविर्जुषन्ति ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
वुभुक्षां जय़ते यस्तु स स्वर्गं जय़ते ध्रुवम् |
६६ क