वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
स रुषा सर्वगात्रेषु तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
स रोषपूर्णोऽशनिवज्रहाटकै; रलङ्कृतं तक्षकभोगवर्चसम् |
६० क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
स रोषमदमत्तो वै कामगादवरुह्य च |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
स रोषवशमापन्नः कर्णमेव जिघांसय़ा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
स रोषवशसम्प्राप्तो नामृष्यत दुरात्मवान् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
स रोषान्निःश्वसन्राजन्निर्दहन्निव चक्षुषा |
१२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
स लक्ष्मणस्येष्वसनं छित्त्वा लक्ष्म च भारत |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स लङ्घय़न्वै सरितो जिघांस; न्स तं वज्रं प्रहरन्तं निरास |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
३४
उत्तर उवाच
स लभेय़ं यदि त्वन्यं हय़यानविदं नरम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
स लव्धकामः पितरमुपेत्याथ ततोऽव्रवीत् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
स लव्धचक्षुर्वलवान्भवेन्नृप; स्तव प्रसादाज्ज्वलनार्कसंनिभः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
स लव्धवलमात्मानं मन्यमानोऽवमन्यते ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
स लव्ध्वा चेतनां द्रोणः क्षणेनैव समाश्वसत् |
७६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
स लव्ध्वा तपसोग्रेण व्राह्मणत्वं महाय़शाः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
९
सूत उवाच
स लव्ध्वा दुर्लभां भार्यां पद्मकिञ्जल्कसप्रभाम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
स लव्ध्वा परमं देवाद्वरं सत्यवतीसुतः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स लव्ध्वा शनकैः सञ्ज्ञां ताश्च दृष्ट्वा स्त्रिय़ो नृप |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
स लव्ध्वा शनकैः सञ्ज्ञां वेपमानो महीपतिः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
स लाङ्गूलरवस्तस्य मत्तवारणनिस्वनम् |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
स लिङ्गान्तरमासाद्य प्राकृतं लिङ्गमव्रणम् |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
स लिप्समानो लभते भूय़िष्ठं राजसान्गुणान् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
स लोकः पुण्यकर्तॄणां नापि युद्धपराङ्मुखैः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
स लोकपरिभूतेन वेषेणास्ते धनञ्जय़ः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
स लोकविदितानश्वान्निजघान महावलः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
स लोकांस्तेजसा सर्वान्स्वभासा निर्विभासय़न् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
स लोकानक्षय़ान्प्राप्तो देवप्रिय़करस्तदा ||
२९ ग
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
स लोकानफलान्दृष्ट्वा तपसा निर्जितानपि |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
स लोकान्प्राप्तवानैन्द्रान्कर्मणा तेन भारत |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
स लोकान्विपुलान्दिव्यानादित्यानामुपाश्नुते ||
८५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
मातो उवाच
स लोके लभते कीर्तिं परत्र च शुभां गतिम् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
स लोके लभते वीर यशः प्रेत्य च सद्गतिम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
स लोभः सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
स लोमपादः परिपूर्णकामः; सुतां ददावृश्यशृङ्गाय़ शान्ताम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
स लोमशः प्रीतमना जगाम; दिवौकसां पुण्यतमं निवासम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
स लोहितं वर्णमुपैति नीलो; मनुष्यलोके परिवर्तते च ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
स वक्तव्यः प्राञ्जलिभिर्भवद्भिः; पुत्रस्य ते पशवः कर्षणं च |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
स वक्तव्यस्त्वय़ा दृष्ट्वा अस्माकं नाथवत्तय़ा ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
स वक्षसि पपातोग्रः शरो व्याल इव श्वसन् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
स वक्ष्यति हितं वाक्यं तथ्यं चैव जनार्दन |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
स वज्रः सुमहातेजाः कालाग्निसदृशोपमः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
स वत्सदन्तं सन्धाय़ जिह्मगानलसंनिभम् |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
स वत्सदन्तैः पृथुपीनवक्षाः; समाचितः स्माधिरथिर्विभाति |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
स वत्समुखविभ्रष्टो भवस्य भुवि तिष्ठतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
स वद्धो वारुणैः पाशैरमर्त्य इव मन्यते |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
स वद्धो वारुणैः पाशैस्तप्यते मृत्युशासनात् ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
स वध्यः सर्वभूतानां प्रेत्य चेह च दुर्मतिः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
स वध्यः सर्वभूतानां व्रह्महेव जुगुप्सितः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
स वध्यः सर्वलोकस्य निन्दितानि समाचरन् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
सञ्जय़ उवाच
स वध्यः सर्वलोकस्य निन्दितानि समाचरन् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
स वध्यः सर्वलोकस्य यथा त्वं पुरुषाधम ||
३३ ख