शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
स वि शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान् ||
३४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
स विकारं शरीरस्य दृष्ट्वा नृपतिरात्मनः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
स विक्रमं हृतं मेने आत्मनः सुमहात्मना |
१२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
स विक्षतो मार्गणैर्व्रह्मराशि; र्देहादजस्रं मुमुचे भूरि रक्तम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
स विक्षरन्नाग इव प्रभिन्नो; गदामस्मै तुमुले प्राहिणोद्वै ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
स विक्षरन्रुधिरं सर्वगात्रै; रथानीकं सूतसूनोर्विवेश |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
स विक्षिप्यार्जुनस्तीक्ष्णान्सैन्धवप्रेषिताञ्शरान् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
स विगाढां निशां दृष्ट्वा सुप्ते चण्डालपक्कणे |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
स विगाह्य चमूं शत्रोः शरशक्तिसमाकुलाम् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
स विघातं पृषत्कानामङ्कुशेन समाचरन् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
स विचर्मा महाराज खड्गपाणिरुपाद्रवत् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स विचर्मा महाराज विरथः क्रोधमूर्छितः |
५१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
पितर ऊचुः
स विचिन्त्य चिरं कालमलर्को द्विजसत्तम |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
स विचिन्त्य महाराज पुनरेवाव्रवीद्वचः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
२३
सूत उवाच
स विचिन्त्याव्रवीत्पक्षी मातरं विनतां तदा |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
स विजित्य गृहीत्वा च नृपतीन्राजसत्तमः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
स विजित्य ततो राजन्नृषिकान्रणमूर्धनि |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
स विजित्य महीं कृत्स्नामानृण्यं प्राप्य वैरिषु |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
स विजित्य महीं सर्वां सशैलवनकाननाम् |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
स विजित्य महीपालांश्चकार वशवर्तिनः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
स विजित्य रणे शूरान्सोमकानां महारथान् |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स विदार्य महासेनां शरैः संनतपर्वभिः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
स विदित्वा तु नृपतिः कुम्भय़ोनिमुपागमत् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
स विदित्वैव नृपतिं तपत्या हृतमानसम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
स विदेहानतिक्रम्य समृद्धजनसेवितान् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
स विद्धः सप्तभिर्वीरैर्द्रोणत्राणार्थमाहवे |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
स विद्धः सूतपुत्रेण छादय़ामास पत्रिभिः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
स विद्धो वहुभिर्वाणैर्जलसन्धेन वीर्यवान् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
स विद्धो वहुभिर्वाणैर्दीप्तास्यैः पन्नगैरिव |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
स विद्धो वहुभिर्वाणैर्नीलाञ्जनचय़ोपमः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
स विद्धो वहुभिर्वाणैर्व्यरोचत महाद्विपः |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
स विद्धो वहुभिर्वाणैस्तोत्त्रैरिव महाद्विपः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
स विद्धो विक्षरन्रक्तं शत्रुसंवारणं महत् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
स विद्धो व्यथितश्चैव मुहूर्तं कश्मलाय़ुतः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
स विद्ध्वा दशभिः पार्थं वासुदेवं च सप्तभिः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
स विद्ध्वा दशभिर्वाणैः साश्वय़न्तारमार्जुनिम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
स विद्ध्वा भारतं षष्ट्या निशितैर्लोमवाहिभिः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
स विद्ध्वा शकुनिं भूय़ः पञ्चभिर्नतपर्वभिः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
स विद्ध्वा समरे द्रोणं सिंहनादममुञ्चत |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
स विद्ध्वा सात्यकिं षष्ट्या तथा षोडशभिः शरैः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
स विद्ध्वा सात्वतं वाणैस्त्रिभिरेव विशां पते |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
स विद्युच्चलितं चापं विहरन्वै तलात्तलम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
स विद्वान्वेदय़ुक्तश्च सिद्धश्चाप्यृषिसत्तमः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स विधन्वा महाराज रथशक्तिं परामृशत् |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
स विध्वस्तैः शरैर्घोरैर्द्रोणपुत्रः प्रतापवान् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
स विनद्य महानादं गजः कङ्कणभूषणः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
सञ्जय़ उवाच
स विनद्य महानादमभीशून्संनिय़म्य च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
स विनश्यति वै क्षिप्रं दीर्घसूत्रो यथा झषः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
स विनिःश्वस्य वहुशो रुदित्वा च मुहुर्मुहुः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स विनिन्दन्नथात्मानं पुनः पुनरुवाच ह |
३ क