वन पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
कपर्दिन्सर्वभूतेश भगनेत्रनिपातन |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
कपर्दी जटिलो मुण्डः श्मशानगृहसेवकः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
कपर्दी शङ्करो रुद्रो भवः स्थाणुरुमापतिः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
कपाटय़ुक्तमज्ञातं समं भूम्या च भारत ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्राह्मणा ऊचुः
कपान्वय़ं विजेष्यामो ये देवास्ते वय़ं स्मृताः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
कपालं वृक्षमूलानि कुचेलमसहाय़ता |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
कपालपाणिः खट्वाङ्गी व्रह्मचारी सदोत्थितः ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
कपालमालिनं रुद्रं भगनेत्रहरं हरम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
कपालमालिनी चैव कृशा च भरतर्षभ |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
कपालमालिने नित्यं सुवर्णमुकुटाय़ च ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कपालमोचनं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम् |
११८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
कपालमोचनं नाम यत्र मुक्तो महामुनिः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
जनमेजय़ उवाच
कपालमोचनं व्रह्मन्कथं यत्र महामुनिः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
कपाले यद्वदापः स्युः श्वदृतौ वा यथा पय़ः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
कपिञ्जलास्तित्तिराश्च कलविङ्काश्च सर्वशः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
कपिध्वजं प्रेक्ष्य विषेदुराजौ; सहैव पुत्रैस्तव कौरवेय़ाः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
कपिध्वजस्य चोत्पाते रथस्यामित्रकर्शिनः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
कपिरन्तर्दधे दिव्यो ध्वजो गाण्डीवधन्वनः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
कपिराजध्वजं सङ्ख्ये विधुन्वानं महद्धनुः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
कपिर्वराहः श्रेष्ठश्च धर्मश्च वृष उच्यते |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
विशोक उवाच
कपिर्ह्यसौ वीक्ष्यते सर्वतो वै; ध्वजाग्रमारुह्य धनञ्जय़स्य |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
कपिलं च महात्मानं तेजोराशिमनुत्तमम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
कपिलं परमर्षिं च यं प्राहुर्यतय़ः सदा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
कपिलं प्राहुराचार्याः साङ्ख्यनिश्चितनिश्चय़ाः ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
कपिलं प्राहुराचार्याः साङ्ख्या निश्चितनिश्चय़ाः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
कपिलश्च ऋषिश्रेष्ठः शालिहोत्रपितामहः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
भीष्म उवाच
कपिलस्य गोश्च संवादं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कपिला सह वत्सेन पर्वते विचरत्युत |
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
कपिलां ये प्रय़च्छन्ति सवत्सां कांस्यदोहनाम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कपिलातीर्थमासाद्य व्रह्मचारी समाहितः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
कपिलानां नरव्याघ्र शतस्य फलमश्नुते ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कपिलानां सहस्रं च वाजिमेधं च विन्दति |
८ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कपिलानां सहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कपिलानां सहस्रस्य फलं विन्दति मानवः ||
३८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
कपिलानां सहस्राणि यो दद्यात्पञ्चविंशतिम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कपिलावटं च गच्छेत तीर्थसेवी नराधिप |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कपिलाह्रदे नरः स्नात्वा राजसूय़फलं लभेत् ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कपिलो नाम देवोऽसौ भगवानजितो हरिः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
कपिलोऽकपिलः शूर आय़ुश्चैव परोऽपरः |
९५ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
कपिश्च जघ्निवान्रक्षः सस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
कपिश्रेष्ठस्तु पार्थस्य व्यादितास्यो भय़ङ्करः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कपिष्ठलस्य केदारं समासाद्य सुदुर्लभम् |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
कपेः पार्श्वगतो भीमस्तस्थौ व्रीडादधोमुखः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
कपेस्तु निनदं श्रुत्वा सन्त्रस्ता तव वाहिनी |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
कपोतके नरः स्नात्वा अष्टावक्रे कृतोदकः |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
कपोतधर्मिणस्तस्य दुर्भिक्षे सति दारुणे |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
कपोतमग्नौ पतितं वाक्यं पुनरुवाच ह ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
कपोतरोमा तृणकः सहदेवार्जुनौ तथा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
कपोतरोमा नीलश्च रुक्मी च दृढविक्रमः ||
६ ख