सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
स विहृत्येह सुसुखी शक्रस्यैति सलोकताम् ||
११६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स विह्वलः प्रहारेण जानुभ्यामगमन्महीम् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
स विह्वलितसर्वाङ्गः क्षितिकम्पे यथाचलः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
स विह्वलितसर्वाङ्गः प्रचचाल रथोत्तमे |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
स विह्वलो महाराज कर्णो भीमवलार्दितः |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
स विह्वलो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् ||
१५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
स विह्वलो महाराज शरवेगेन संय़ुगे |
५१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स विह्वलो यय़ौ भूमिं ततोऽस्यापाहरच्छिरः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
स वीतहव्यदाय़ादैरागत्य पुरुषर्षभ |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
स वीर किं मुह्यसि नावधीय़से; नदन्त्येते कुरवः सम्प्रहृष्टाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
स वीरः सत्यवान्प्राज्ञो धर्मनित्यः सुदारुणः |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
कृप उवाच
स वीरशय़ने शेते क्रव्याद्भिः परिवारितः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
स वीर्यमदमत्तत्वाद्भीष्मद्रोणावुपाश्रितः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
स वीर्यवान्द्रोणपुत्रस्तरस्वी; व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ||
९१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
स वुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
भीष्म उवाच
स वुद्धिमुत्तमां प्राप्तो नैष्ठिकीमकुतोभय़ाम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
स वुद्धिश्रुतसम्पन्नस्तं दृष्ट्वातीव भीषणम् |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स वुद्ध्वा चरणस्पर्शमुत्थाय़ रणदुर्मदः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
स वुद्ध्वा तस्य राष्ट्रस्य व्यवसाय़ं हि सर्वशः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
स वृक्षमूले कस्मिंश्चिद्वेदानुच्चारय़न्स्थितः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
स वृक्षस्तेन दष्टः सन्सद्य एव महाद्युते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
स वृक्षाग्रप्रसुप्तो वा पतितः प्रतिवुध्यते ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
स वृत्तवांस्तेषु कृताभिषेकः; सहानुजः पार्थिवपुत्रपौत्रः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
स वृद्धवालमादाय़ द्वारवत्यास्ततो जनम् |
२२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
स वृद्धावन्धपितरौ महारण्येऽभ्यपूजय़त् ||
६ ख
मौसल पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
स वृष्णिनिलय़ं गत्वा दारुकेण सह प्रभो |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
स वृष्णिवंशप्रभवो महान्वंशः प्रजापतेः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
स वेगवति कौन्तेय़ साम्वो वेगवतीं गदाम् |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
स वेगय़ुक्तं चिक्षेप कर्णपुत्रस्य संय़ुगे ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
स वेत्ति गन्धांश्च रसाञ्श्रुतिं च; स्पर्शं च रूपं च गुणाश्च येऽन्ये ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
स वेत्ति दुःखानि सुखानि चात्र; तद्विप्रय़ोगात्तु न वेत्ति देहः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
स वेदनार्तोऽम्वुदनिस्वनो नदं; श्चलन्भ्रमन्प्रस्खलितोऽऽतुरो द्रवन् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
स वेदाध्ययने युक्तो जमदग्निर्महातपाः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
स वेदान्विव्रुवन्धीमान्मातुर्विज्ञाय़ चिन्तितम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
स वेदे मोक्षशास्त्रे च स्वे च शास्त्रे कृतागमः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
स वेपमान उत्थाय़ मातुरस्याः पिता तदा |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
स वै केनचिदर्थेन तय़ा मन्दो व्ययुज्यत |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
स वै क्रुद्धः सिंह इवात्यमर्षी; नामर्षय़त्प्रतिघातं रणे तम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
स वै क्षारकमादाय़ द्विजान्हत्वा वने सदा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
स वै तथा वक्र एवाभ्यजाय़; दष्टावक्रः प्रथितो वै महर्षिः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
स वै तदा वादविदा निगृह्य; निमज्जितो वन्दिनेहाप्सु विप्रः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
स वै तस्या रज आपद्यते वै; स गर्भभूतः समुपैति तत्र ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
स वै तस्यामवस्थाय़ां सर्वत्यागकृतः सुखी |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
स वै त्वमागतानस्मान्दमय़न्त्यै निवेदय़ |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
स वै दीर्घतमा नाम शापादृषिरजाय़त |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
श्रीभगवानु उवाच
स वै देशः सेवितव्यो मा वोऽधर्मः पदा स्पृशेत् ||
७८ ग
वन पर्व
अध्याय
६६
सुदेव उवाच
स वै द्यूते जितो भ्रात्रा हृतराज्यो महीपतिः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
स वै धर्मविरुद्धं त्वं कस्मात्कर्म चिकीर्षसि ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
स वै धर्मो यत्र न पापमस्ति; सर्वैरुपाय़ैर्हि स रक्षितव्यः ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
स वै धर्मो विप्रलुप्तः सभाय़ां; पापात्मभिः सौवलेय़प्रधानैः |
५ क