द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
स शव्दो भरतश्रेष्ठ व्याप्य सर्वा दिशो दश |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स शस्त्रवृष्ट्याभिहतः प्राद्रवद्द्विगुणं पदम् |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
स शापात्तस्य विप्रर्षेर्विश्वामित्रस्य चाज्ञय़ा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
स शापादृषिमुख्यस्य दीर्घं तम उपेय़िवान् |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
स शालिभवनं रम्यं सर्वसस्यसमाचितम् |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
स शाल्वराजस्य शिनिप्रवीरो; जहार भल्लेन शिरः शितेन ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
स शाल्ववाणै राजेन्द्र विद्धो रुक्मिणिनन्दनः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
स शाश्वतीः समा राजन्प्रजा धर्मेण पालय़न् |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
स शिक्षय़ामास च गीतवादितं; सुतां विराटस्य धनञ्जय़ः प्रभुः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
स शिलाय़ां शिरः कृत्वा पर्णान्यास्तीर्य भूतले |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
स शिल्पं प्राप्य तत्सर्वं सविशेषं च सञ्जय़ |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
स शिवस्तात तेजस्वी प्रसादाद्याति तेऽग्रतः |
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स शिष्यान्न किञ्चिदुवाच |
८४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
स शीघ्रगामिना तेन रथेन यदुपुङ्गवः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
स शीघ्रतरमादाय़ धनुरन्यत्प्रतापवान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
स शीघ्रममलप्रज्ञः कर्म दग्ध्वा शुभाशुभम् |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
द्रौपद्यु उवाच
स शुद्धभावो निकृतिप्रवृत्ति; मवुध्यमानः कुरुपाण्डवाग्र्यः |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परन्तपम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
स शुश्राव महावाहुः कपिलेन महात्मना |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
स शूद्रः संशिततपाः सत्यसन्धो जितेन्द्रिय़ः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
स शून्यमाश्रमारण्यं वरुणस्यात्मजस्य तत् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
स शूरः सत्यवाक्प्राज्ञो वलवान्सत्यविक्रमः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
स शूरः सैन्धवप्रेप्सुरन्वय़ाद्भारतीं चमूम् ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
स शूरमानी समरे समेत्य; कच्चित्त्वय़ा निहतः संय़ुगेऽद्य ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
स शूरसेनान्कार्त्स्न्येन पूर्वमेवाजय़त्प्रभुः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स शूलभृच्छोणितभृत्कराल; स्तं कर्मभिर्विदितं वै स्तुवन्ति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
स शृङ्गेऽप्रतिमे दिव्ये हिमवन्मेरुसम्भवे |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
स शेते निष्टनन्भूमौ वातरुग्ण इव द्रुमः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
स शेते निष्टनन्भूमौ वातरुग्ण इव द्रुमः |
१५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
स शेते निहतो भूमौ पुत्रो मे पृथिवीपतिः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
स शेते निहतो राजन्सङ्ख्ये भीष्मः शिखण्डिना ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
स शेते भगवानप्सु योऽसावतिवलः प्रभुः |
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
स शेते शरतल्पस्थो मेदिनीमस्पृशंस्तदा |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
स शेषः पन्नगश्रेष्ठः स्वस्ति तुभ्यं प्रय़च्छतु ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
स शेष्यते वै निहतश्चिराय़; शास्त्रातिगो भीमवलाभिभूतः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
स शैनेय़ जवेनात्र गन्तुमर्हसि माधव ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
स शैनेय़ं रणे क्रुद्धः प्रदहन्निव चक्षुषा |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
स शैलं मानसं गत्वा ध्याय़न्नर्थमिमं भृशम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
स शैलः काञ्चनः सर्वः सम्वभौ कुरुसत्तम ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
स शैलमासाद्य किरीटमाली; महेन्द्रवाहादवरुह्य तस्मात् |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
स शोकं जहि दुर्धर्ष मा च मन्युवशं गमः |
२३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
स शोचत्यापदं प्राप्य यथाहमतिवर्त्य तौ ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
स शोचन्भरतश्रेष्ठ न शान्तिमधिगच्छति ||
५३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
स शोचय़ति मामद्य भीमसेन तवानुजः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
स शोभमानो वरदः खड्गी वाणी शरासनी |
९४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
स श्राद्धय़ज्ञो ववृधे वहुगोधनदक्षिणः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
स श्रिय़ो भाजनं राजन्यश्चापत्सु न मुह्यति ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
स श्रुतर्वाणमादाय़ वध्र्यश्वमगमत्ततः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
स श्रुत्वा निहतं कर्णं दुर्योधनहितैषिणम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
स श्रुत्वा माधवं यातं सदश्वैरनिलोपमैः |
३ क