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शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
धर्मात्मा लभते कीर्तिं प्रेत्य चेह यथासुखम् ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मात्मा स तदादृश्यः सोऽपि तात द्विजातिभिः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
धर्मात्मा सततं भूत्वा कामात्मा समपद्यत ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
धर्मात्मा सत्यवाक्चैव राजा रञ्जय़ति प्रजाः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मात्मा सर्वलोकेषु सत्यवागिति विश्रुतः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मात्मा हि सुखं राजा प्रेत्य चेह च नन्दति ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
प्रह्राद उवाच
धर्मात्मानं जितक्रोधं संय़तं संय़तेन्द्रिय़म् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
धर्मात्मानं त्वाहुरेकं सर्वे राजन्महीक्षितः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मात्मानं महात्मानं शूरमिन्द्रसमं युधि ||
८० ख
वन पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मात्मानं विदुरमगाधवुद्धिं; सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
धर्मात्मानमतस्तुभ्यमनुजानीमहे सुतम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
धर्मात्मानो जितात्मानः शान्ता दान्ता विमत्सराः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
धर्मादधर्मश्चरितो गरीय़ा; निति ध्रुवं नास्ति कृतं न साधु ||
८७ ख
वन पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मादधर्मश्चरितो गरीय़ा; नितीव मन्येत नरोऽल्पवुद्धिः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मादधर्मो वलवान्सम्प्राप्त इति मे मतिः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
व्यास उवाच
धर्मादपि मनुष्येषु कामोऽर्थश्च यथा गुणैः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
धर्मादपेतं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मादपेतं व्रुवतीं भीष्मो भूय़ोऽव्रवीदिदम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मादपेतमर्थाच्च कर्म साधुविगर्हितम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
धर्मादपेता ये चान्ये मय़ा नात्रानुकीर्तिताः |
३६ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मादर्थात्सुखाच्चैव मा राजन्नीनशः प्रजाः ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मादिन्द्राच्च वाय़ोश्च सुषुवे या सुतानिमान् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
धर्मादुत्कृष्यते श्रेय़स्तथाश्रेय़ोऽप्यधर्मतः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
पितो उवाच
धर्माद्या हि यथा त्रेता वह्नित्रेता तथैव च |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्माद्युधिष्ठिरो जज्ञे मारुतात्तु वृकोदरः |
९७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
धर्मादय़ो द्वादश चाततानाः; शास्त्रे गुणा ये विदिता द्विजानाम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मादय़ो भविष्यन्ति समाहूता दिवौकसः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३२
भीष्म उवाच
धर्माधर्मफले जातु न ददर्शेह कश्चन ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
धर्माधर्मविदो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
युधिष्ठिर उवाच
धर्माधर्मविमुक्तं यद्विमुक्तं सर्वसंश्रय़ात् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
धर्माधर्मविशेषज्ञः सर्वं तरति दुस्तरम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
धर्माधर्मे नृणां देव व्रूहि मे संशय़ं विभो ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
धर्माधर्मेण राजानश्चरन्ति विजिगीषवः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
धर्माधर्मौ गृहीत्वेह सर्वे वर्तामहेऽध्वनि ||
७४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
धर्माधर्मौ च दानस्य यथा पूर्वर्षिभिः कृतौ ||
१०१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
धर्माधर्मौ च राजेन्द्र प्राकृतं परिगर्हय़न् ||
९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
धर्माधर्मौ पुण्यपापे सत्यासत्ये तथैव च ||
९६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
धर्माधर्मौ प्रकाशश्च तमो दुःखं सुखं तथा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
धर्माधर्मौ हि लोकस्य यो वै वेत्ति स वुद्धिमान् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
धर्माननुय़ुय़ुक्षन्तस्तेभ्यः प्रव्रूहि भारत ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मानुगतय़ा वुद्ध्या न किञ्चित्साहसं कृतम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मान्नानाविधांश्चैव को व्रूय़ात्तमृते प्रभुम् ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
कामन्द उवाच
धर्मान्वितान्सम्प्रविशेद्वहिः कृत्वैव दुष्कृतीन् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
धर्मान्वितेषु विज्ञातो मन्त्री गुप्तश्च पाण्डव |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
धर्मान्वेषी गुणाकाङ्क्षी स स्वर्गं समुपाश्नुते ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
धर्मान्साधारणांस्तात विस्तरेण शृणुष्व मे ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मापेक्षो नरो नित्यं सर्वत्र लभते सुखम् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्माभिकाङ्क्षी यजते न धर्मफलमश्नुते ||
२३ ख