chevron_left  arrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
स समेत्य महेन्द्राण्या देवराजः शतक्रतुः |
४ क
वन पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
स सम्पश्यन्गिरिनदीर्वैडूर्यमणिसंनिभैः |
९ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
स सम्पातिस्तदा राजञ्श्रुत्वा सुमहदप्रिय़म् |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलः कटुकः शोणितोदकः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलः समरूप इवाभवत् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलः सम्प्रवृत्तः सुदारुणः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तस्य तेषां च धन्विनाम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषां मम च भारत |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषामासीत्किरीटिना |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलो द्रोणसात्वतय़ोरभूत् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलो निशि प्रत्यभवन्महान् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
स सम्प्रहारो ववृधे भीरूणां भय़वर्धनः |
१० क
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
स सम्प्रहाय़ शय़नं राजपुत्र्या प्रवोधितः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
स सम्प्राप्य शुभान्कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
स सम्भारान्समाहृत्य नृपो धर्मात्मजस्तदा |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
स सम्भावय़ नागेन्द्र मय़ि सर्वं महामते |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
स सम्यक्पूजय़ित्वा तं विद्वान्विप्रर्षभस्तदा |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
स सरांसि नदीश्चैव वनान्युपवनानि च |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
स सर्गकाले च करोति सर्गं; संहारकाले च तदत्ति भूय़ः ||
११० ख
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
स सर्पसत्रात्किल नो मोक्षय़िष्यति वीर्यवान् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
स सर्वं क्षत्रमुत्साद्य स्ववीर्येणानलद्युतिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
स सर्वतः परिभ्रष्टः सार्थाद्देशात्तथार्थतः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
स सर्वतः परिवृतस्त्रिगर्तैः सुमहात्मभिः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
स सर्वतः प्रेक्ष्य दिशो विशून्या; भय़ावदीर्णैः कुरुभिर्विहीनः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
स सर्वत्र गतान्क्षुद्रान्व्राह्मणैः परिवारितः |
९३ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
स सर्वदमनो नाम कुमारः समपद्यत |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
स सर्वदोषनिर्मुक्तस्ततः पश्यति यत्परम् |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
स सर्वभावानुगतेन चेतसा; नृपामिषेणेव झषो विकृष्यते ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
स सर्वभय़निर्मुक्तः शात्रवानधितिष्ठति ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
स सर्वरथिनां श्रेष्ठः पाण्डवः सत्यविक्रमः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
स सर्वलोकादुपलभ्य पाप; मधर्मवुद्धिर्निरय़ं प्रय़ाति ||
९७ ख
वन पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
स सर्वविद्द्रौपदीं प्रेक्ष्य कृष्णां; युधिष्ठिरं भीमसेनार्जुनौ च |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
स सर्वसुखकृज्ज्ञेय़ः प्रजा धर्मेण पालय़न् ||
९८ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
स सर्वानाश्रमान्गत्वा शैव्यया सह भार्यया |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
स सर्वान्पार्थिवाञ्जित्वा सर्वांश्च महतो गणान् |
८४ क
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
स सर्वान्म्लेच्छनृपतीन्सागरद्वीपवासिनः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १५०
कुन्त्यु उवाच
स सर्वेष्वपि लोकेषु प्रजा रञ्जय़ते ध्रुवम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
स सर्वय़ज्ञफलभाग्राजा लोके महीय़ते ||
१०६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
स सर्वय़ज्ञैरीजानः प्राप्नोत्यभय़दक्षिणाम् |
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
स सर्वय़ज्ञैरीजानो राजाथाभय़दक्षिणैः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
स सवृक्षक्षुपलतो हिरण्मय़ इवाभवत् ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
स सव्यं मण्डलं राजन्नुद्भ्राम्य कृतनिश्चय़ः |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
स सव्यसाची गुप्तस्ते विजय़ी च नरेश्वर |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
स सव्यसाची भीमेन चोदितः केशवेन च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
स सहस्रार्चिषं देवं प्रविशेन्नात्र संशय़ः ||
११७ ख
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
स साक्षादेव सर्वाणि शक्रात्परपुरञ्जय़ः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
स सागरं समासाद्य गङ्गाय़ाः सङ्गमे नृप |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
पितर ऊचुः
स सागरान्तां धनुषा विनिर्जित्य महीमिमाम् |
३ क