मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
स स्त्रीषु प्राप्तकालं वः पाण्डवो वालकेषु च |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स स्त्रीसमृद्धं वहुरत्नपूर्णं; लभत्ययत्नोपगतं गृहं वै ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स स्थावरं जङ्गमं चैवमेत; च्चतुर्विधं लोकमिमं च कृत्वा |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
स स्नातो यो दमस्नातः सवाह्याभ्यन्तरः शुचिः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
स स्नात्वा प्राप्स्यते लोकान्देहन्यासाच्च दुर्लभान् ||
५१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
स स्नुषामव्रवीत्काले कल्यवादी महातपाः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स स्म कृत्वा विरूपाणि वदनान्यशुभाननः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
स स्म कौसल्यमागम्य राजामात्यमलङ्कृतम् |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
स स्म गत्वा यथोद्दिष्टां दिशं वह्नेर्महीपतिः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
स स्म नित्यं निशापाय़े प्रातरुत्थाय़ वीर्यवान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
स स्म पापकृतां लोकान्गच्छेदशुभकर्मणा |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
स स्म भुङ्क्ते सहस्राणां वहूनामन्नमेकदा |
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
स स्म सञ्चरते लोकान्ये दिव्या ये च मानुषाः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स स्यन्दनाद्गामपतद्गतासुः; परश्वधैः शाल इवावरुग्णः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
स स्वरः सानुनादी च सर्वगः स्निग्ध एव च |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
स स्वर्गजित्तमोऽस्माकं सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
स स्वर्गसदृशो देशस्तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
स स्वैरं व्रूहि विप्रर्षे श्रोतुमिच्छामि ते वचः ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
स ह तेनैव रक्तेन सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
स ह भीष्मेण यद्युक्तमस्माभिः शोककारिते ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
स हंसः सम्प्रमत्तानामप्रमत्तः स्वकर्मणि ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
स हतः खलु पापात्मा गन्धर्वैर्दुष्टपूरुषः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
स हतः पतितः शेते गन्धर्वैर्निशि भारत |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
स हतः प्रापतद्भूमौ रथाज्ज्योतिरिवाम्वरात् ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
स हतः प्रापतद्भूमौ स्वरथाद्रथिनां वरः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
स हतः प्रापतद्राजन्नकुलेन महात्मना |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
स हताश्वादवप्लुत्य छिन्नधन्वा रथोत्तमात् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
स हताश्वादवप्लुत्य रथाद्वै रथिनां वरः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
स हताश्वादवप्लुत्य स्यन्दनाद्धतसारथिः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स हताश्वाद्रथात्तूर्णं खड्गमादाय़ विद्रुतः |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
स हताश्वान्महावाहुरवप्लुत्य रथाद्वली |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
स हताश्वे रथे तिष्ठञ्श्रुतकर्मा महारथः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
स हताश्वे रथे तिष्ठन्ददर्श भरतर्षभ |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स हताश्वे रथे तिष्ठन्मद्राधिपतिराय़सीम् |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
स हताश्वे रथे तिष्ठन्राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् |
३७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
कृप उवाच
स हतो ग्रसते पांसून्पश्य कालस्य पर्ययम् ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स हतो न्यपतद्भूमौ विमूढो विकृताननः ||
५६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स हतो भीमसेनेन वैरं प्रतिचिकीर्षता ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स हतो यज्ञसेनस्य पुत्रेणेह शिखण्डिना |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
स हत्वा क्षत्रधर्माणं जगाम धरणीतलम् |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
स हत्वा दस्युसङ्घातानृषीन्करमदापय़त् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
स हत्वा दानवगणान्पूज्यमानो महर्षिभिः |
७९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
स हत्वा भक्षय़ित्वा च जम्वुकोष्ट्रं ततस्तदा |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स हत्वा राक्षसीं सेनां शुशुभे सूतनन्दनः |
८३ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
स हत्वा रावणं क्षुद्रं राक्षसेन्द्रं सुरद्विषम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
हनूमानु उवाच
स हत्वा वालिनं राज्ये सुग्रीवं प्रत्यपादय़त् |
३२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
स हत्वा विपुलाः सेनाः स्वय़ं मृत्युवशं गतः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स हत्वा सर्वकालिङ्गान्सेनामध्ये व्यतिष्ठत |
१०८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स हत्वा सैन्धवं सङ्ख्ये पुनरेतु धनञ्जय़ः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
स हन्ता द्विषतां सङ्ख्ये दिष्ट्या जीवति फल्गुनः ||
३५ ख