कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
सञ्छाद्यमानः सहसा कर्णचापच्युतैः शरैः |
६७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
सञ्छाद्यमानस्तु तदा द्रोणपुत्रेण मारिष |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्छाद्यमाने खगमैरस्यता सव्यसाचिना ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
सञ्छाद्यमानो वहुधा पार्षतेन महात्मना |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
सञ्छाद्यमानो विशिखैर्धृष्टद्युम्नेन भारत |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिद्य चापानि च तानि राज्ञां; तेषां रणे वीर्यवतां क्षणेन |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
सञ्छिद्य भूमौ नृपतेऽपातय़ं पन्नगानिव ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्छिद्य मौरवान्पाशान्निहत्य मुरमोजसा |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्छिद्यमानमिषुभिरस्यता सव्यसाचिना ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिन्दन्तौ हि गात्राणि सन्दधानौ च साय़कान् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिन्नभिन्नध्वजिनश्च के चि; त्केचिच्छरैरर्दितभिन्नदेहाः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
सञ्छिन्नभिन्नवर्माणो वैक्लव्यं परमं गताः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिन्नभुजनागेन्द्रां वहुरत्नापहारिणीम् |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिन्नरश्मिय़ोक्त्राक्षान्व्यनुकर्षय़ुगान्रथान् |
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिन्ना नेमिषु गता मृदिताश्च हय़द्विपैः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिन्ना वाहवः पेतुर्नृणां भल्लैः किरीटिना ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिन्नान्यर्जुनशरैः शिरांस्युर्वीं प्रपेदिरे ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिन्नान्यात्मगात्राणि वाहनानि च संय़ुगे ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सञ्छिन्नय़ोक्त्ररश्मीकान्वित्रिवेणून्विकूवरान् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
सञ्जघानासकृद्द्रोणं विभित्सुररिवाहिनीम् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
सञ्जज्ञे तुमुलः शव्दः पततां परमर्मसु ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सञ्जज्ञे यादृशो द्रौणेः कृष्णौ सञ्छादय़िष्यतः ||
११६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
सञ्जज्ञे रणभूमौ तु परलोकवहा नदी |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जल्पन्ती सुमधुरं रमय़ामास पाण्डवम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सञ्जहार ततो भीष्मस्तदस्त्रं पावकोपमम् ||
१३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जहार तदा दृष्टिं कृष्णश्चाप्यपराजितः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
सञ्जहार धनुःश्रेष्ठात्तूणे चैव न्यवेशय़त् ||
२५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जहार शरं दिव्यं त्वरमाणो धनञ्जय़ः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जहारास्त्रमथ तत्प्रसृष्टं पाण्डवर्षभः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जह्रुः प्रद्रुतानश्वाञ्शरवेगान्धनूंषि च ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
सञ्जातमुपजीवन्स लभते सुमहत्फलम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
सञ्जातरुधिरश्चाजौ सात्वतेषुभिरर्दितः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
सञ्जातरुधिरोत्पीडः पपात च ममार च ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सञ्जातरुधिरोत्पीडः प्रेक्षणीय़ोऽभवद्रणे |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
सञ्जातरुधिरोत्पीडो द्रौणिः क्रोधसमन्वितः ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
सञ्जातरुधिरोत्पीडो धातुचित्र इवाद्रिराट् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जातवलरूपेषु तदैव निहता नृपाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
सञ्जातैर्जाय़ते गात्रैः कर्मजैर्व्रह्मणा वृतः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
सञ्जाय़ते व्राह्मणेषु ज्ञानं वुद्धिसमन्वितम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
सूत उवाच
सञ्जिजीवय़िषुं प्राप्तं राजानमपराजितम् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जीवनीं ततो देवा विषादमगमन्परम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जीवनीं प्राप्य विद्यां महार्थां; तुल्यप्रभावो व्रह्मणा व्रह्मभूतः ||
५७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जीवितं पुनः पुत्र ततो द्रष्टासि पाण्डवम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
सञ्जीवितश्चापि मय़ा वासवानुमते तदा |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
मरुत्त उवाच
सञ्जीवितोऽहं भवता वाक्येनानेन नारद |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
सञ्जीव्य कालमिष्टं च सशरीरो दिवं गतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
सञ्जीवय़न्प्रजाः सर्वा जनय़ामास चौषधीः ||
९० ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जीवय़ित्वा चैनमुवाच |
९२ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
सञ्जीवय़ित्वा तान्सर्वान्पुनर्जग्मुस्त्रिविष्टपम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
सञ्जीवय़ित्वा सख्ये वै प्रादात्तं गौतमं तदा ||
१२ ख