भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
वाद्यमानासु भेरीषु मृदङ्गेष्वानकेषु च ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
वादय़न्ति स्म संहृष्टाः कुशलाः साधुशिक्षिताः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
वादय़न्ति स्म संहृष्टाः सहस्राय़ुतशो नराः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
वादय़ामास संहृष्टो नानावाद्यानि सर्वशः ||
४६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
वादय़ामासुरव्यग्रा भेरीशङ्खांश्च पुष्कलान् ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
वादय़ामासुरव्यग्राः पुरुषा राजशासनात् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
वाधते खलु मा शीतं हिमत्राणं विधीय़ताम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
स्त्र्यु उवाच
वाधते मैथुनं विप्र मम भक्तिं च पश्य वै |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
वाधते स्म परं शक्त्या तमुत्तङ्काश्रमं प्रभो ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
वाधितव्याः सुरगणा ऋषय़श्च तपोधनाः |
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
वाधितो वन्धुभिः सार्धं वलाद्वलवता विभो |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
वाधिर्यं प्राणमन्दत्वं यः पश्यति स मुच्यते ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
वाधेतामानुषः शत्रुर्यदा त्वां वीर कश्चन |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
वाध्यन्ते न च वित्तेषु प्रभुत्वमिह कस्यचित् ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
वाध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
वानप्रस्थं द्विजातीनां त्रय़ाणामुपदिश्यते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
वानप्रस्थं भैक्षचर्यां गार्हस्थ्यं च महाश्रमम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
८६
अष्टक उवाच
वानप्रस्थः सत्पथे संनिविष्टो; वहून्यस्मिन्सम्प्रति वेदय़न्ति ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हिचित् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
वानप्रस्थविधानज्ञो जाजलिर्ज्वलितः श्रिय़ा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
वानप्रस्थाः पृश्नय़श्च स्थिता व्रह्मानुशासने ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४२
भीष्म उवाच
वानप्रस्थाश्रमं केचिद्गार्हस्थ्यं केचिदाश्रिताः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
वानप्रस्थाश्रमं गच्छेत्कृतकृत्यो गृहाश्रमात् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
वानप्रस्थाश्रमेऽप्येताश्चतस्रो वृत्तय़ः स्मृताः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
उमो उवाच
वानप्रस्थेषु देवेश स्वशरीरोपजीविषु ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
वानप्रस्थेषु यो धर्मस्तं मे शृणु समाहिता |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
वानप्रस्थेषु विप्रेषु त्रैविद्येषु च भारत |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
वानप्रस्थैरिदं कर्म कर्तव्यं शृणु यादृशम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
वानप्रस्थैर्गृहस्थैश्च यतिभिर्व्रह्मचारिभिः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
वानप्रस्थो गृहस्थश्च ततोऽन्यः सम्प्रवर्तते ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
वानरं केतुमासाद्य सञ्चचाल महाचमूः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
वानरं चैव कन्या त्वां विवाहात्प्रभृति प्रभो |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
वानरध्वजमुच्छ्रित्य विष्वक्सेनधनञ्जय़ौ ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
वानरर्क्षवरस्त्रीषु जनय़ामासुरात्मजान् |
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
वानरश्च ध्वजो दिव्यो निःसङ्गो धूमवद्गतिः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
वानराः पक्षिणश्चैव ये मनुष्यानुकारिणः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
वानराणां तु यत्सीता ह्रिय़माणाभ्यवासृजत् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
वानरास्याः प्रवाहाश्च वक्रा वक्रभय़ाः शकाः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
वानरेन्द्रौ महावीर्यौ पृथक्पृथगदृश्यताम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
वानरो दश वर्षाणि त्रीणि वर्षाणि मूषकः |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
वानरो रोचमानश्च केतुः केतुमतां वरः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
वानरोऽहं न ते मार्गं प्रदास्यामि यथेप्सितम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
वानस्पत्यं च भौमं च यद्द्रव्यं निय़तं मखे ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
वानस्पत्यो वाजसेनो नित्यमाश्रमपूजितः ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
वानेय़ं च मृगांश्चैव शुद्धैर्वाणैर्निपातितान् |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वानेय़पुष्पनिकरैराज्यधूमोद्गमैरपि |
८ क
वन पर्व
अध्याय
४७
जनमेजय़ उवाच
वानेय़मथ वा कृष्टमेतदाख्यातु मे भवान् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
वानेय़मनभिज्ञं च नारीणामार्जवे रतम् ||
२५ ख