कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
संनिपातः समो लोके भवतोर्नास्ति कश्चन ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
संनिपाते वलौघानां प्रेषितैर्वरवारणैः |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
संनिपाते वलौघानां वीतमाददिरे गजाः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
संनिपातो न गन्तव्यः शक्ये सति कथञ्चन |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
संनिपेतुरकुण्ठाग्रा नागेषु च हय़ेषु च ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
संनिमज्जज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
संनिरुद्धं रणे द्रोणं पाञ्चाला वीक्ष्य मारिष |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
संनिरुद्धस्तु तेनात्मा सर्वेष्वाय़तनेषु वै |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
संनिरुद्धस्तु तैः पार्थो महावलपराक्रमः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
संनिरुद्धाश्च कौरव्यैर्द्रोणेन च महात्मना |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
संनिरुध्येन्द्रिय़ग्राममासीत्काष्ठोपमस्तदा ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
संनिवर्त महावेग न वेगं विषहामि ते ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
संनिवर्त्यात्मनो नागं क्षेमधूर्तिः प्रय़त्नतः |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
संनिवर्त्यानुजान्सर्वानिति होवाच भारत ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
संनिवर्तय़ कौन्तेय़ क्षुत्पिपासे वलान्वय़ात् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
संनिवार्य च योधान्स्वान्सत्येन शपथेन च |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
संनिवार्य ततः सेनां कुरूनप्यवधीद्वली ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
संनिवार्य तु तान्वाणान्नकुलः परवीरहा |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
संनिवार्य शरांस्तांस्तु कृपः शारद्वतो युधि |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
संनिवार्य स तां घोरां शरवृष्टिं समुत्थिताम् |
७३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
जनमेजय़ उवाच
संनिविष्टं कुरुक्षेत्रे वासुदेवेन पालितम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
संनिविष्टः शुभे रम्ये भूमिभागे यथेप्सितम् |
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
संनिविष्टेषु पार्थेषु प्रय़ातास्तं ह्रदं शनैः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
संनिवृत्तस्ततस्तूर्णं राधेय़ः शत्रुकर्शनः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
संनिवृत्तांस्ततस्तांस्तु दृष्ट्वा राजा सुय़ोधनः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
संनिवृत्ताश्च ते शूरास्तान्दृष्ट्वैव विचेतसः ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
संनिवृत्तास्तु ते शूरा दृष्ट्वा सात्वतमाहवे |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
संनिवृत्ते तव सुते सर्व एव जनाधिपाः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
संनिवृत्ते वलौघे तु शाल्वो म्लेच्छगणाधिपः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
संनिवृत्तेषु तेष्वेवं युद्धमासीत्सुदारुणम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
संनिवेश्य च कौरव्य द्वारकाय़ां नरर्षभ |
७ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
संनिहित्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे |
१६७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
संनिय़च्छति यो वेगमुत्थितं क्रोधहर्षय़ोः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
संनिय़म्य तु तान्येव ततः सिद्धिमवाप्नुते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
संनिय़म्य तु तान्येव सिद्धिं प्राप्नोति मानवः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
संनिय़म्येन्द्रिय़ग्रामं गोष्ठे भाण्डमना इव |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
संनिय़म्येन्द्रिय़ग्रामं निर्घोषे निर्जने वने |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
संनिय़म्येन्द्रिय़ग्रामं सर्वत्र समवुद्धय़ः |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
संनिय़म्येन्द्रिय़ग्राममास्थिताः परमं तपः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
संन्यवर्तत तं कर्णः सङ्घट्टित इवोरगः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
संन्यस्तकवचा देहैर्विपत्राय़ुधजीविताः ||
५८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
संन्यस्य विविधा विद्याः सर्वं संन्यस्य चैव ह ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
संन्यस्य वीराः शस्त्राणि प्राध्याय़न्त समन्ततः ||
१०९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
संन्यस्य सर्वकर्माणि संन्यस्य विधिवत्तपः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
युधिष्ठिर उवाच
संन्यस्यते यथात्माय़ं संन्यस्तात्मा यथा च यः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
संन्यस्यत्यथ वा तां वै समाधौ पर्यवस्थितः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
संन्यस्याग्नीनुपासीनाः पश्यन्ति विगतज्वराः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
संन्यास एव वेदान्ते वर्तते जपनं प्रति |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
संन्यासं तप इत्याहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः |
१ क