सभा पर्व
अध्याय
१५
युधिष्ठिर उवाच
संन्यासं रोचय़े साधु कार्यस्यास्य जनार्दन |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
संन्यासः कर्मय़ोगश्च निःश्रेय़सकरावुभौ |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः पराय़णम् ||
७५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
संन्यासकृतवुद्धिं तं ततो दृष्ट्वा महातपाः |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
संन्यासकृतवुद्धिं तं भूतानि पितृभिः सह |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
संन्यासनिरता नित्यं ये व्रह्मविदुषो जनाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
संन्यासफलिकः कश्चिद्वभूव नृपतिः पुरा |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
संन्यासस्तु महावाहो दुःखमाप्तुमय़ोगतः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महावाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
संन्यासी ज्ञानसंय़ुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम् |
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
संन्यासय़ोगय़ुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
संनय़ेत्पुष्टिय़ुक्तेषु विवाहेषु रहःसु च ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
संमतः स महीपालः प्रसन्नपुरराष्ट्रवान् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
संमतः सर्वभूतानां सर्वलोकनमस्कृतः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
संमतः सर्वभूतानामुच्छ्वसन्को न जीवति ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
संमतश्चाभवत्तेषामाश्रमेऽऽश्रमवासिनाम् ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
संमते सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
संमन्तव्यं महाराज पाण्डवानां च दर्शनम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
संमन्त्रणीय़ो मान्यश्च ज्ञानेन तपसा तथा ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
संमन्त्र्य चाशु गच्छामः साधनार्थं महीपतेः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
संमन्त्र्य सहिताः सर्वाः श्रिय़मूचुर्नराधिप ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
संमन्त्र्य सहितैः सर्वैर्द्रष्टव्यमकुतोभय़म् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
संमन्येऽहं तव प्रज्ञां यन्मोक्षात्प्रत्यनन्तरम् |
१६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
संमन्येऽहं तव प्रज्ञां यस्त्वं मम हिते रतः |
१७७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
संममर्द च तत्सैन्यं पिता देवव्रतस्तव |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
संमर्दः सुमहाञ्जज्ञे घोररूपो भय़ानकः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
संमर्द्यान्ये रणे केचिन्निद्रान्धाश्च परस्परम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
संमानश्चावमानश्च लाभालाभौ क्षय़ोदय़ौ |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२५०
वैशम्पाय़न उवाच
संमानिता यास्यथ तैर्यथेष्टं; विमुच्य वाहानवगाहय़ध्वम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
संमानोऽभ्यधिकस्तेन प्रय़ुक्तोऽय़मसंशय़म् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
संमान्यमानाश्चैताभिः सर्वकार्याण्यवाप्स्यथ |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
संमान्यांश्चावमन्यन्ते वृद्धान्परिभवन्ति च |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
संमानय़ति सत्कृत्य स मां पृच्छतु पाण्डवः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
संमार्जञ्जठरेणोर्वीं विवर्तंश्च मुहुर्मुहुः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५९
दुर्योधन उवाच
संमार्जतां वेश्म परैतु शीघ्र; मानन्दो नः सह दासीभिरस्तु ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
संमितः सामवेदेन पुरैवादिय़ुगे कृतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
संमिते पुष्कराणां च स्नात्वार्च्य पितृदेवताः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
संमिमानय़िषुर्वीरानिष्वासांश्चाप्ययुध्यत ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
संमुह्यति तदा सैन्ये त्वरमाणो धनञ्जय़ः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
भीम उवाच
संमुह्यमानाः कौरवाः सर्व एव; द्रवन्ति नागा इव दावभीताः |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
युधिष्ठिर उवाच
संमुह्यामि विषीदामि धर्मो मे शिथिलीकृतः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
संमूढां दुःखशोकार्तां व्यासो मातरमव्रवीत् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
संमूढोऽस्मि भृशं तात श्रुत्वा कृष्णधनञ्जय़ौ |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
संमूर्छितोऽभवद्राजा साश्रुकण्ठो युधिष्ठिरः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
संमृजानो धनुः श्रेष्ठं ज्यां विकर्षन्पुनः पुनः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
संमृष्टसंसिक्तरजः प्रतिपेदे महापथम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
संमोहं परमं गत्वा प्रैक्षत द्रोणजं ततः ||
११९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
संमोहकं तमो विद्यात्कृष्णमज्ञानसम्भवम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
संमोहचिन्ताविटपः शोकशाखो भय़ङ्करः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
संमोहनं शत्रुसहोऽन्यदस्त्रं; प्रादुश्चकारैन्द्रिरपारणीय़म् ||
८ ख