द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
संरव्धास्तं जिघांसन्तो भारद्वाजस्य पश्यतः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
संरव्धैश्चारिभिर्वीरैः प्रार्थय़द्भिर्जय़ं मृधे |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
संरव्धो मामव्रवीत्तीक्ष्णरोषः; संवर्तो वाक्यं चरितव्रह्मचर्यः ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
संरव्धोऽथ भरद्वाजः फल्गुनं प्रत्ययुध्यत ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
संरव्धौ क्रोधताम्राक्षौ प्रेक्ष्य कर्णवृकोदरौ |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
संरव्धौ हि महावाहू परस्परवधैषिणौ |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
संरव्धय़ोर्महाराज समरे चित्रय़ोधिनोः |
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
संरव्धय़ोस्तदा घोरं सुचिरं भरतर्षभ ||
४९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
संरोधादाय़ुषस्त्वेते व्यस्यन्ते द्वापरे युगे ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
संरोधादाय़ुषस्त्वेते व्यस्यन्ते द्वापरे युगे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
संरोष्यमाणः प्रतिमृष्यते यः; स आदत्ते सुकृतं वै परस्य ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
संरोहति शरैर्विद्धं वनं परशुना हतम् |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
संरोहत्यकृतप्रज्ञः सन्तापेन हि पादपम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
संलापात्तेन विप्रेण तथा सा तत्र भाषिता |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
संलापोल्लापकुशला नृत्तगीतविशारदाः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
संलीनानपि दुर्गेषु निन्यतुर्यमसादनम् ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
संलीनान्युध्यमानांश्च सर्वान्द्रौणिरपोथय़त् ||
१२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
धृतराष्ट्र उवाच
संलोड्यमानेषु पृथग्विधेषु; के वस्तदानीं मतिमन्त आसन् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
संवत्सरं तं तु विहृत्य गूढं; नराधमं तं सुखमुद्धरेम |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
संवत्सरं तीव्रकोपा पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठिता ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
संवत्सरं द्वादश मासमाहु; र्जगत्याः पादो द्वादशैवाक्षराणि |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
संवत्सरं द्वे अय़ने वदन्ति; सङ्ख्याविदो दक्षिणमुत्तरं च ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय
९९
व्यास उवाच
संवत्सरं यथान्याय़ं ततः शुद्धे भविष्यतः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
संवत्सरं विप्रणय़ेत्तस्माज्जातः पुनर्भवेत् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
संवत्सरं विराटस्य दास्यमास्थाय़ चोषिताः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
संवत्सरं व्रती भूत्वा तथा मुच्येत किल्विषात् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
संवत्सरं व्रह्मचारी निय़तः संशितव्रतः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
संवत्सरः किञ्चिदूनो न निष्क्रान्ताहमाश्रमात् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
संवत्सरः स ऋतुः सोऽर्धमासः; सोऽहोरात्रः स कला वै स काष्ठाः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
संवत्सरगतो वापि द्विसंवत्सर एव वा |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
संवत्सरद्वय़ं तं तु गान्धारी गर्भमाहितम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
संवत्सरमिमं तात तथाशीला वुभूषवः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
संवत्सरमिहैकं तु मासि मासि पिवेत्पय़ः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
संवत्सरमुपास्याग्निमभिशस्तः प्रमुच्यते |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
संवत्सरमुषित्वाण्डे निष्क्रम्य च महामुनिः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
संवत्सरर्तवो मासा रजन्यश्च दिनानि च ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
संवत्सरर्तवो मासाः पक्षाहोरात्रसन्धय़ः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
संवत्सरर्तवो मासाः पक्षाहोरात्रय़ः क्रमात् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
संवत्सरविय़ोगस्य सम्भवेय़ुः शरीरिणः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
संवत्सरसहस्रे तु गते दिव्ये महानदी |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
संवत्सरस्थाय़िनौ च ग्रहौ प्रज्वलितावुभौ |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
संवत्सरस्य पर्यन्ते निःश्वासः सम्प्रवर्तते |
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
संवत्सराः पञ्चय़ुगमहोरात्राश्चतुर्विधाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
संवत्सरानहोरात्रानृतूनथ लवान्क्षणान् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
संवत्सरानृतून्मासान्न वुवोध वहून्गतान् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो भवेत् ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
संवत्सराहिते गर्भे गान्धार्या जनमेजय़ |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
नारद उवाच
संवत्सरेण क्षीणाय़ुर्देहन्यासं करिष्यति ||
२२ ख