कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकानां कदनमकरोद्यत्र पाण्डवः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकानां किञ्चिदेवावशिष्टं; सर्वस्य सैन्यस्य हतं मय़ार्धम् ||
९६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकानां कौन्तेय़ः प्रपक्षं त्वरितोऽभ्ययात् ||
९९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
संशप्तकानां च वले पाण्डवेन महात्मना |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकानामय़ुतं रथानां; मृत्युर्जय़ो वार्जुनस्येति सृष्टाः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
संशप्तकान्कथं पार्थो गतः कर्णश्च पाण्डवान् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
संशप्तकान्निहतानर्जुनेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
भीम उवाच
संशप्तकान्प्रतिय़ोत्स्यामि सङ्ख्ये; सर्वानहं याहि धनञ्जय़ेति ||
६४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकान्प्रमथ्यैतांस्ततः कर्णवधे त्वर ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
संशप्तकावशेषं च कृतं निःशेषमाहवे ||
१६३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकावशेषस्य नाराय़णवलस्य च ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
संशप्तकाश्च ते वीरा राक्षसाविष्टचेतसः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकाश्च मां राजन्नाह्वय़न्ति पुनः पुनः ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकाश्च मे वध्या द्रौणिराह्वय़ते च माम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
संशप्तकाश्च वहवः किमन्यद्भागधेय़तः ||
३४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकास्तु समरे शरवृष्टिं समन्ततः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकेषु पार्थश्च कौरवेषु वृकोदरः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकेषु शूरेषु किञ्चिच्छिष्टेषु भारत ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकैर्युध्यमानस्य मेऽद्य; सेनाग्रय़ाय़ी कुरुसैन्यस्य राजन् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
संशप्तानि च वृन्दानि क्षत्रिय़ाणां परन्तप |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
संशमो वाहुवीर्यं च ख्यापितं माधवात्मनः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
संशान्तमपि मद्रेशं लक्ष्मीर्नैव व्यमुञ्चत ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
संशितात्मा जितक्रोधस्तर्पय़न्पितृदेवताः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
शकुन्तलो उवाच
संशितात्मा सुदुर्धर्ष उग्रे तपसि वर्तते ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
संशीलय़न्देवय़ानीं कन्यां सम्प्राप्तय़ौवनाम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
संशुष्कवदना वीराः शिरोभिश्चारुकुण्डलैः ||
१७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
संशुष्कास्याश्चलन्नेत्राः प्रस्विन्ना लोमहर्षणाः ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
संशुष्कास्याश्चलन्नेत्राः प्रस्विन्ना लोमहर्षिणः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
संशोधय़ेत्तथा कूपान्कृतान्पूर्वं पय़ोर्थिभिः ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
संशोषणमिवाचिन्त्यं समुद्रस्याक्षय़ाम्भसः ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
संश्रवे धृतराष्ट्रस्य गान्धार्याश्चाप्यमर्षणः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
संश्रितं वापि यस्त्यक्त्वा साधुं तद्वचने रतम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
संश्रिता दानवानां वै साह्यार्थे दर्पमोहिताः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
संश्रिताः कौरवं पक्षं जातस्नेहाश्च साम्प्रतम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
संश्रितास्तद्विय़ोगे हि सशरीरा न सन्ति ते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
संश्रित्य सन्धावति शुक्लमेत; मष्टापरानर्च्यतमान्स लोकान् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
संश्रुतं च मय़ा पूर्वं ददानीत्यविचारितम् |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
उत्तङ्क उवाच
संश्रुतश्च मय़ा योऽर्थो गुरवे राजसत्तम |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
संश्रुत्य धर्मराजस्य यज्ञं यज्ञविदस्तदा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
कृशतनुरु उवाच
संश्रुत्य नोपक्रिय़ते परं शक्त्या यथार्हतः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
संश्रुत्य यो न दित्सेत याचित्वा यश्च नेच्छति |
७२ क
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
संश्रुत्योदाहृतं वाक्यं भूतमन्तर्हितं ततः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
संश्रय़ः श्लाघनीय़स्त्वमन्येषामपि भास्वताम् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
संश्रय़त्येव तच्छीलं नरोऽल्पमपि वा वहु ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
संश्रय़ाद्द्रोणभीष्माभ्यां कर्णस्य च विकत्थनात् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११४
भीष्म उवाच
संश्रय़ेद्वैतसीं वृत्तिमेवं प्रज्ञानलक्षणम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
संश्लिष्टा नाभिजाय़न्ते यथाप इह पांसवः ||
१०० ग
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
संश्लिष्टाः पार्थ शोभन्ते गन्धमादनसानुषु ||
७१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
संश्लिष्टाङ्गौ स्थितौ राजञ्जघानैकेषुणार्जुनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
संश्लिष्टे श्वेतपीते द्वे रुक्मरूप्यमय़े शुभे ||
८ ख