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कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
संसक्तेषु च सैन्येषु युध्यमानेषु भागशः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
संसत्सु वदतां येषां हंसानामिव सङ्घशः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
संसरन्तमपि प्रेतं विषमेष्वेकपातिनम् |
४४ क
विराट पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
संसरन्ति दिशः सर्वा यशसोऽस्य गभस्तय़ः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
संसर्गं च न गच्छेत तथाय़ुर्विन्दते महत् ||
९९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
संसर्गविद्याकुशलस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
संसर्गाद्धनुषि श्रेष्ठस्ततोऽहमभवं द्विज ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
संसर्गाद्वाथ पापानामधर्मरुचिता नृणाम् ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
संसर्गाभिरतं मूढं शरीरमिति धारणा ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
संसर्पणाद्धि सेनाय़ा भय़ं भीरून्प्रवाधते |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
संसर्पतामुदीर्णानां विमर्दः सुमहानभूत् ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
संसर्पन्तो यथा मेघा घर्मान्ते मन्दमारुताः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
संसाधनार्थं प्रय़युः क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
संसाध्य तु महात्मानं भीष्मं भीमपराक्रमम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
संसाधय़ित्वैव कुरूञ्शरौघैः; कपिध्वजः पक्षिवरध्वजश्च |
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
संसाधय़िष्यथान्योन्यं स्वर्गाय़ कुरुपाण्डवाः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
संसारचक्रमासाद्य कृमिय़ोनौ प्रजाय़ते |
८३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
संसारतन्त्रवाहिन्यस्तत्र वुध्येत योषितः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
संसारतारणं ह्यस्य कालेन महता भवेत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
संसारश्चैव भूतानां धर्मस्य च फलोदय़ः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
संसारसागरगमां योनिपातालदुस्तराम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
संसारांश्च वहून्गत्वा ततस्तिर्यक्प्रजाय़ते ||
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
संसाराणां शतं गत्वा कृमिय़ोनौ प्रजाय़ते ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
संसाराणामसङ्ख्यानां कामात्मा तदवाप्नुय़ात् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
संसारे पच्यते जन्तुस्तत्कथं नाववुध्यसे ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
संसारे पच्यमानश्च दोषैरात्मकृतैर्नरः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
संसारेषु विचित्रेषु पच्यमानाः पुनः पुनः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
संसारेष्वनुभूतानि कस्य ते कस्य वा वय़म् ||
३८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
संसारेष्वनुभूतानि कस्य ते कस्य वा वय़म् ||
१२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
संसारेऽस्मिन्समाजाताः प्राणिनः पृथिवीपते ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
संसारय़ति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
संसिक्तगात्रो रुधिरेण सोऽभू; त्क्रौञ्चो यथा स्कन्दहतो महाद्रिः ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
संसिक्तमृष्टपन्थानं पताकोच्छ्रय़भूषितम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
संसिद्धः पुरुषो लोके यदाचरति पापकम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
शुक्र उवाच
संसिद्धरूपोऽसि वृहस्पतेः सुत; यत्त्वां भक्तं भजते देवय़ानी |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
संसिद्धस्त्वं महाभाग त्वं च सिद्धस्तथा नृप ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
संसिद्धस्त्वं महावाहो कुरु कार्यमनुत्तमम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
संसिद्धाः परमं स्थानं गताः कर्मभिरीदृशैः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
संसिद्धाः प्रेत्य गन्धर्वैः सह मोदन्त्यनामय़ाः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
संसिद्धाधिगमं कुर्यात्कर्म हिंसात्मकं त्यजेत् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
संसिद्धास्तपसा तात ये चान्ये स्वर्गवासिनः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११
अर्जुन उवाच
संसिद्धास्ते गतिं मुख्यां प्राप्ता धर्मपराय़णाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४
युधिष्ठिर उवाच
संसिद्धिं परमां प्राप्तः श्रोतुमिच्छामि तं नृपम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
संसिद्धैर्निय़तैः सद्भिर्वनवासमुपागतैः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५१
नाग उवाच
संसिद्धो मानुषः काय़ो योऽसौ सिद्धगतिं गतः |
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
संसीदमानो निपपात मह्यां; वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
संसुप्तानेव राजेन्द्र तत्र तत्र महारथान् |
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
संसृष्टं व्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रं च व्रह्मसंहितम् |
१८ क