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विराट पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
संस्थाप्य चाश्वान्कौन्तेय़ः समुद्यम्य च रश्मिभिः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
काक उवाच
संस्थाप्य तं चापि पुनः समाश्वास्य च खेचरम् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
संस्थाप्य तामाश्रमदर्शने तु; सन्तारितां नावमतीव शुभ्राम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
संस्थाप्य मामिह वली पाण्डवेय़ः प्रतापवान् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
संस्थाप्यमाना यत्नेन गोविन्देनार्जुनेन च ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
संस्थाप्यैवं तस्य राज्ञस्तं क्रतुं शक्रतेजसः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
संस्थापय़ पथिष्वस्मांस्तिष्ठ राजन्स्ववर्त्मनि ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
संस्थितान्यभिय़ातानि ददर्शाय़ुतशस्तदा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
संस्थिते तु नृपे तस्मिञ्शास्त्रमेतत्सनातनम् |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
संस्पर्शपरिचर्यस्तु वैश्येन क्षत्रिय़ेण च ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
संस्पर्शाद्दर्शनाद्वापि श्रवणाद्वापि जाय़ते ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
संस्पृशन्तः स्वकान्वाहून्दशन्तो दशनच्छदान् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
संस्पृशन्नासनं शौरेर्महामतिरुपाविशत् ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
संस्पृशन्निव सर्वास्ताः शिखाभिः काञ्चनप्रभाः |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
संस्पृशानः शरांस्तीक्ष्णांस्तूणादाशीविषोपमान् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २५७
वैशम्पाय़न उवाच
संस्पृशेदीदृशो भावः शुचिं स्तैन्यमिवानृतम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
संस्पृशेय़ुर्यदान्योन्यं कथञ्चिद्वाय़ुनाग्नय़ः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वामदेव उवाच
संस्पृशैनां महिषीं साय़केन; ततस्तस्मादेनसो मोक्ष्यसे त्वम् |
७८ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
संस्पृश्य तानि चापानि भानुमन्ति वृहन्ति च |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
ऋषभ उवाच
संस्पृश्य पादौ शिरसा निपपात द्विजर्षभे ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
संस्पृश्य मूर्ध्नि पाणिभ्यामिदं वचनमव्रवीत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
संस्पृश्यापः शुचिर्भूत्वा भूतलं समुपाश्रितः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
संस्पृश्याम्भस्ततः कृष्णः प्राङ्मुखः समवस्थितः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
संस्पृष्टः स्थाणुना सद्यो निर्व्रणः समजाय़त ||
१५१ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मरंश्चाक्षय़ाँल्लोकान्विजितान्स्वेन कर्मणा |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
संस्मरंस्तं परिक्लेशं योत्स्यते परवीरहा ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मरन्तो वधं वीराः सिन्धुराजस्य धीमतः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
संस्मरन्तो विमनसो व्यपय़ाता नराधिप ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मरन्परुषा वाचः सूतपुत्रस्य पाण्डवः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मरन्विविधान्क्लेशान्दुर्योधनकृतान्वहून् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
संस्मरन्वै परिक्लेशं स्वपितुर्विक्रमिष्यति ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मरन्सङ्गमं चैव वचनं चैव तस्य तत् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ६३
वृहदश्व उवाच
संस्मर्तव्यस्तदा तेऽहं वासश्चेदं निवासय़ेः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
संस्मृत्य चापि सुमहदाख्यानं पुरुषर्षभ |
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मृत्य तदहं सम्यक्कर्तुमिच्छामि पाण्डवाः ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
संस्मृत्य तदृषेर्वाक्यं स्पृहय़न्ती दिवाकरम् |
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मृत्य देवीं गान्धारीं धृतराष्ट्रं च पार्थिवम् |
३९ ख
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
संस्मृत्य नागराजानं ततो लेभे वपुः स्वकम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
संस्मृत्य पूर्वजातिं स निर्वेदं परमं गतः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
संस्मृत्य भर्तारमथो रुदती शोकमूर्छिता ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
संस्मृत्य भर्तुर्वचनं गृहस्थाश्रमकाङ्क्षिणः ||
५६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मृत्य भीमस्तद्वैरं यदन्याय़वदाचरेत् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
संस्मृत्य मन्त्रितं पूर्वं निग्रहे भीमकर्मणः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मृत्य मुनिसन्देशमिदं वचनमव्रवीत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
संस्मृत्य रामं मनसा महात्मा; तपस्विमध्येऽस्मय़तामितौजाः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्राह्मण उवाच
संस्मृत्य वाक्यं धर्मज्ञ गुणवानसि मे मतः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
संस्मृत्य सर्वदुःखानि तव दुर्मन्त्रितेन च ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
संस्यूत इव सूर्यस्य रश्मिभिर्जलदो महान् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
श्रीकृष्ण उवाच
संस्यूतान्वाजिभिः सार्धं धरण्यां पश्य चापरान् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
संस्वेदजा अण्डजा उद्भिदाश्च; सरीसृपाः कृमय़ोऽथाप्सु मत्स्याः |
१० क