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शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
इन्द्रमेनं प्रवृणुते यद्राजानमिति श्रुतिः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रलोकं जगामाशु श्रुत्वा तत्रार्जुनं गतम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
इन्द्रलोकाभिगमनं पर्व ज्ञेय़मतः परम् |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रविष्णुसमावेतौ मन्दात्मा नाववुध्यते |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रवीर्योपमः कृष्णः संविष्टो माभ्यभाषत ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रवृत्राविव क्रुद्धौ सूर्याचन्द्रमसप्रभौ |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रवैश्रवणावेतां दिशं पाण्डव रक्षतः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
इन्द्रशत्रो विवर्धस्व प्रभावात्तपसो मम ||
४३ ग
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनः सुषेणश्च भीमसेनश्च नामतः ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनद्वितीय़स्तु रथात्प्रस्कन्द्य धर्मराट् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनमुखांश्चैव भृत्यान्पौरोगवांस्तथा |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनमुखांश्चैव भृत्यान्सूतांश्च सर्वशः ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
इन्द्रसेनमुखाश्चेमे रथानादाय़ केवलान् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
इन्द्रसेनस्य जननी कुपिता माशपत्पुरा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
इन्द्रसेनां च तां कन्यामिन्द्रसेनं च वालकम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
इन्द्रसेनां सह भ्रात्रा समभिज्ञाय़ वाहुकः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २३२
युधिष्ठिर उवाच
इन्द्रसेनादिभिः सूतैः संय़ताः कनकध्वजाः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनादिभिर्भृत्यै रथैः परिचतुर्दशैः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २४४
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनादिभिश्चैव प्रेष्यैरनुगतास्तदा ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनादय़श्चैनान्भृत्याः परिचतुर्दश |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनादय़श्चैव रथैस्तैः सुसमाहितैः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनेन सहित इन्द्रप्रस्थं यय़ौ तदा ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रसेनो विशोकश्च पूरुश्चार्जुनसारथिः |
३० क
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
इन्द्रसोमाग्निवरुणा देवासुरमहोरगाः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
इन्द्रस्तस्या वचः श्रुत्वा दुःखितोऽचिन्तय़द्भृशम् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
इन्द्रस्तां दुःखितां दृष्ट्वा अव्रवीत्परुषं वचः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
इन्द्रस्तु भूय़ः पप्रच्छ क्व विशेषो भवेदिति ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
इन्द्रस्तु विस्मितो हृष्टः स्त्रिय़ं पप्रच्छ तां पुनः |
४० क
वन पर्व
अध्याय १४०
लोमश उवाच
इन्द्रस्य जाम्वूनदपर्वताग्रे; शृणोमि घोषं तव देवि गङ्गे |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
इन्द्रस्य दय़ितं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १७१
अर्जुन उवाच
इन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभिः सह ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५१
ऋत्विज ऊचुः
इन्द्रस्य भवने राजंस्तक्षको भय़पीडितः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५१
सूत उवाच
इन्द्रस्य भवने विप्रा यदि नागः स तक्षकः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
इन्द्रस्य महिषी देवी कस्मान्मां नोपतिष्ठति ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
इन्द्रस्य लोका विरजा विशोका; दुरन्वय़ाः काङ्क्षिता मानवानाम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय २८४
जनमेजय़ उवाच
इन्द्रस्य वचनादेत्य पाण्डुपुत्रं युधिष्ठिरम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
इन्द्रस्य वज्रं दय़ितं प्रजज्वाल व्यथान्वितम् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
इन्द्राण्यु उवाच
इन्द्रस्य वाजिनो वाहा हस्तिनोऽथ रथास्तथा |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वासुदेव उवाच
इन्द्रस्य सह वृत्रेण यथा युद्धमवर्तत ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
इन्द्रस्यातिथय़ो ह्येते भवन्ति पुरुषर्षभ ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रस्यापि भय़ं ह्येते जनय़ेय़ुर्महाहवे |
४० क
विराट पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रस्याप्यासनं राजन्नय़मारोढुमर्हति |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रस्येवाय़ुधस्यासीद्रूपं भरतसत्तम ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
इन्द्रहस्ताच्च्युतो नागः ख एव यदतिष्ठत |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
इन्द्राच्छतगुणः शौर्ये वीर्ये चैव मनोजवः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्राज्ञय़ा यय़ौ पार्थः स्तूय़मानः समन्ततः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
इन्द्राणी वारुणी वा त्वं त्वष्टुर्धातुः प्रजापतेः |
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
इन्द्राणी सम्प्रहृष्टा सा सम्पूज्यैनामपृच्छत |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२
वृहस्पतिरु उवाच
इन्द्राणीं विश्रुतां लोके शक्रस्य महिषीं प्रिय़ाम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
देवा ऊचुः
इन्द्राणीमानय़िष्यामो यथेच्छसि दिवस्पते |
९ क