आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
स क्षिप्रमुदकं स्पृष्ट्वा रोषादिदमुवाच ह |
९ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
स क्षुत्पिपासाध्वकृशस्तरस्वी; समेत्य नानाय़ुधवाणपाणिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
स क्षुपो नाम सम्भूतः प्रजापतिररिन्दम |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
स क्षेत्रज्ञः सत्त्वसङ्घातवुद्धि; र्गुणातिगो मुच्यते मृत्युपाशात् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
स खन्यमानः सहितैः सागरैर्वरुणालय़ः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
स गङ्गाद्वारमासाद्य निवेशमकरोत्प्रभुः ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
स गङ्गामनु वृन्दानि स्त्रीणां भरतसत्तम |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
स गङ्गामभिसङ्गम्य निय़ोगाद्व्रह्मणः प्रभुः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
स गङ्गामिव गच्छन्तीमालम्व्य जगतीपतिः ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
स गङ्गाय़ामुपस्पृश्य पुण्यगन्धं पय़ः शुचि |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
स गच्छ रत्नान्यादाय़ विविधानि वसूनि च |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
स गच्छ विनिवर्तस्व कुरुक्षेत्रं रणप्रिय़ |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
स गच्छ शीघ्रं प्रहितो रथेन; पाञ्चालराजस्य चमूं परेत्य |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
स गच्छत्यूर्ध्वगो वाय़ुः कृच्छ्रान्मुक्त्वा शरीरिणम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
स गच्छन्कानने तस्मिन्हेमजालपरिष्कृतम् |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
स गच्छन्ददृशे धीमान्नन्दनप्रतिमं वनम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
स गच्छन्व्राह्मणै राजंस्तत्र तत्र महाभुजः |
१३ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
स गच्छेत मय़ा सार्धमानृशंस्या हि मे मतिः ||
७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
स गच्छेत्परमां सिद्धिमिति मे नास्ति संशय़ः ||
५३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
स गच्छेदभ्यनुज्ञातो भवता यदि मन्यसे |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
इन्द्र उवाच
स गच्छेद्व्रह्मणो लोकमव्ययं च नरोत्तम ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
स गजान्गदय़ा निघ्नन्व्यचरत्समरे वली |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
स गजौघमहावेगः परासुनरशैवलः |
६१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
स गतः कुरुभिः सार्धं महावुद्धिः पराभवम् ||
२४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स गतः परमां सिद्धिं यदर्थं परितप्यसे ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
स गतः सुरवासं तं निवसन्मुदितः सुखम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
स गतस्तस्य तृप्तिं तु गन्धं सुरभिमुद्गिरन् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
स गतासुर्नरस्तादृङ्मत्स्ययोनौ प्रजाय़ते ||
१०४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
स गतासुर्महाराज पपात धरणीतले |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
स गतिं परमां प्राप्तो दुष्प्रापामजितेन्द्रिय़ैः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
स गतो नृपतिः क्षिप्रं पुत्रैस्तैः सर्वतोदिशम् ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
स गत्वा तपसः पारं दीप्तस्य स नराधिपः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
स गत्वा तपसः पारं देहमुत्सृज्य भारत |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
स गत्वा तपसा सिद्धिं लोकान्विष्टभ्य तेजसा |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
स गत्वा तैस्तदा चिह्नैर्ददर्श गिरिगह्वरे |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
स गत्वा त्वरितं वीरं जहि सौभद्रमाहवे |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
स गत्वा त्वरितो राजन्गौतमस्य निवेशनम् |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
स गत्वा त्वरितो राजन्दुर्योधनमते स्थितः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
स गत्वा त्वरितो राजन्देवैः सम्प्रेषितः कचः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
स गत्वा दूरमध्वानं वसिष्ठाश्रममभ्ययात् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
स गत्वा द्विजशार्दूलो हिमवन्तं महागिरिम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
स गत्वा नलिनीं रम्यां राक्षसैरभिरक्षिताम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
स गत्वा परमप्रीतो मातरं मातुलं च तम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
स गत्वा पर्वतश्रेष्ठं गन्धमादनमव्ययम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
स गत्वा पाण्डवावासमुवाचाभिप्रणम्य तान् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
स गत्वा पाण्डुपुत्रेण तरसा वाहुशालिना |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
स गत्वा पितरं तस्या वरय़ामास तां तदा |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
स गत्वा पुनरागच्छत्प्रसन्नेषु द्विजातिषु |
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
स गत्वा प्रतिकूलं तच्चकार यमशासनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
स गत्वा भ्रातरं शङ्खमार्तरूपोऽव्रवीदिदम् |
२० क