अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
संहृष्टवदनो राजा सभार्यः कुशिको मुनिम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
संहृष्टवाहनाः सर्वे सर्वे शतशरासनाः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
संह्राद इति विख्यातः प्रह्रादस्यानुजस्तु यः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
संह्रादनो राजरथो य इहास्मानुपावहत् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
संह्रादय़न्तश्च तथा निर्घाताश्चापतन्क्षितौ |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
संय़च्छ त्वं हय़ानस्य राधेय़स्य महात्मनः ||
१२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
संय़च्छ मामकानश्वांस्तथैव त्वं वृहन्नडे |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
संय़च्छन्भवति प्राणान्नसंय़च्छंस्तु पापकः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
संय़च्छामि निय़च्छामि लोकेषु प्रभुरीश्वरः ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
संय़च्छामि हय़ानेष युध्यतो वै कपर्दिनः ||
१०७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
संय़तः सततं युक्त आत्मवान्विजितेन्द्रिय़ः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
संय़तस्तेन पाशेन मत्स्यः परपुरञ्जय़ |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ता गुप्तधान्या च सुसंमृष्टनिवेशना ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
संय़तात्मा कृतप्रज्ञो भूतिकामश्च भूमिपः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
संय़तात्मा भय़ात्तेषां न पात्राद्विन्दुमुत्सृजेत् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
संय़ताश्च हि दक्षाश्च मतिमन्तश्च मानवाः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
संय़ताश्चापि दक्षाश्च मतिमन्तश्च मानवाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
संय़ते मय़ि नूनं त्वमात्मानं वहु मन्यसे ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
संय़त्ताः समरे शूरा भीमसेनमुपाद्रवन् ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
संय़त्ताः समरे सर्वे पालय़ध्वं पितामहम् ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६९
विदुर उवाच
संय़न्ता सहदेवस्तु धौम्यो व्रह्मविदुत्तमः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
संय़न्तारः प्रहर्तारः कृतास्त्रा भारसाधनाः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
संय़न्तारः स्थावराणां जङ्गमानां च सर्वशः ||
६४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
संय़मश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
संय़मेन नवं वन्धं निवर्त्य तपसो वलात् |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
संय़म्यैनं ततो राज्ञे दस्यूंश्चैव न्यवेदय़न् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
संय़ाजय़न्तो विप्रांश्च राजन्यांश्च विशस्तथा ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ातिः खलु दृषद्वतो दुहितरं वराङ्गीं नामोपय़ेमे |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
संय़ावं कृसरं मांसं शष्कुली पाय़सं तथा |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
संय़ावापूपमांसानि ये च लोका वृथाश्नताम् |
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
संय़ाहि भारतीं वीर यावद्धन्मि शितैः शरैः |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
सहदेव उवाच
संय़ुक्त एकदुःखश्च वीर्यवांश्च महीपतिः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
संय़ुक्तं रथमास्थाय़ प्राय़ाद्भीष्मरथं प्रति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधहर्षासमञ्जसाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधामर्षसमन्विताः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
संय़ुक्तो देशकालाभ्यां वलैरात्मगुणैस्तथा ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ुक्तो हि वलैः कश्चित्प्रमादान्नोपय़ुज्यते |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
संय़ुगं गच्छ भीष्मेण भिन्धि त्वं शिरसा गिरिम् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
संय़ुगं ये करिष्यन्ति नररूपेण वाय़ुना |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
संय़ुगे च प्रकाशेते संरव्धाविव कुञ्जरौ ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
संय़ुगे निहतो रोषात्कार्तवीर्यो महावलः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ुगे वै महाराज दृश्यते सुमहान्क्षय़ः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
संय़ुगे स्म प्रकाशेते गिरी सशिखराविव ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
संय़ुज्यते धनुषा वर्मणा च; हस्तत्राणै रथशस्त्रैश्च भूय़ः ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
संय़ुञ्जन्तु रणे क्षिप्रं शास्त्रवद्रथय़ोजकाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
संय़ोगलक्षणोत्पत्तिः कर्मजा गृह्यते यय़ा |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
भीष्म उवाच
संय़ोगव्रतखिन्नानां वानप्रस्थाश्रमौकसाम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ोगा विप्रय़ुक्ता वा पूर्वदेहेषु पार्थिव ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
संय़ोगा विप्रय़ोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
संय़ोगा विप्रय़ोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ||
१८ ख