अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नानूहापोहविशारदान् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
ज्ञानविज्ञानिनः केचित्परं पारं तितीर्षवः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
ज्ञानवित्त्वेन कर्माणि कुर्वन्सर्वत्र सिध्यति ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
ज्ञानवृद्धं च वृद्धं च भूय़ांसं केशवं मम |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
ज्ञानवृद्धा मय़ा राजन्वहवः पर्युपासिताः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
ज्ञानवृद्धान्प्रशंसन्तः शुश्रूषन्तः परस्परम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
ज्ञानवृद्धो द्विजातीनां क्षत्रिय़ाणां वलाधिकः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
ज्ञानसम्पन्नसत्त्वानां तत्सुखं विदुषां मतम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
ज्ञानस्य लाभं परमं वदन्ति; जितेन्द्रिय़ार्थाः परमाप्नुवन्ति ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
ज्ञानहीनस्तथा लोके तस्माज्ज्ञानविदोऽधिकाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
ज्ञानागमेन कर्माणि कुर्वन्कर्मसु सिध्यति ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं वुधाः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
ज्ञानात्मकाः संय़मिनो महर्षय़ः; पश्यन्ति नित्यं पुरुषं गुणाधिकम् ||
८९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
ज्ञानात्मानं तथा विद्यात्पुरुषं सर्वजन्तुषु ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
ज्ञानादपेत्य या वृत्तिः सा विनाशय़ति प्रजाः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
ज्ञानादेव च वैराग्यं जाय़ते येन मुच्यते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
ज्ञानाधिष्ठानमज्ञानं त्रीँल्लोकानधितिष्ठति |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
ज्ञानाधिष्ठानमज्ञानं वुद्ध्यहङ्कारलक्षणम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
ज्ञानानां च फलानां च ज्ञेय़ानां कर्मणां तथा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
ज्ञानानि च समग्राणि प्रतिभास्यन्ति तेऽनघ |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
ज्ञानानि चाप्यविज्ञाय़ करिष्यन्ति क्रिय़ास्तथा |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ज्ञानान्मोक्षो जाय़ते पूरुषाणां; नास्त्यज्ञानादेवमाहुर्नरेन्द्र |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञानान्यल्पीभविष्यन्ति तस्मात्त्वां चोदय़ाम्यहम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
जनमेजय़ उवाच
ज्ञानान्येतानि व्रह्मर्षे लोकेषु प्रचरन्ति ह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञानान्वितेषु मुख्येषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
ज्ञानाभ्यासाज्जागरतो जिज्ञासार्थमनन्तरम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
ज्ञानारामस्य वुद्धस्य सर्वभूताविरोधिनः |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
ज्ञानाश्रय़ं तृप्तितोय़मन्तःक्षेत्रज्ञभास्करम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
ज्ञानिनां सम्भवं श्रेष्ठं स्थानमव्रणमच्युतम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
भीष्म उवाच
ज्ञाने ह्येवं प्रवृत्तिः स्यात्कार्याकार्ये विजानतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
ज्ञानेन कुरुते यत्नं यत्नेन प्राप्यते महत् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
ज्ञानेन तपसा चैव धीराः पश्यन्ति तत्पदम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
ज्ञानेन निर्मलीकृत्य वुद्धिं वुद्ध्या तथा मनः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
ज्ञानेन परिसङ्ख्याय़ सदोषान्विषय़ान्नृप |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
ज्ञानेन यच्छेदात्मानं य इच्छेच्छान्तिमात्मनः ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
ज्ञानेन विविधान्क्लेशानतिवृत्तस्य मोहजान् |
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
भीष्म उवाच
ज्ञानेन हि यदा जन्तुरज्ञानप्रभवं तमः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
ज्ञानेनानेन कौन्तेय़ तुल्यं ज्ञानं न विद्यते ||
९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
ज्ञानेन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थान्नोपसर्पन्त्यतर्षुलम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
ज्ञानेन्द्रिय़ाण्यतः पञ्च पञ्च कर्मेन्द्रिय़ाण्यपि |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
ज्ञानेन्धितं ततो ज्ञानमर्कवत्सम्प्रकाशते ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
ज्ञानोत्पन्नं च यच्छौचं तच्छौचं परमं मतम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानय़ज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानय़ज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
ज्ञानय़ुक्तेन मनसा सन्ततेन विचक्षणः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
ज्ञानय़ोगे च ये दोषा गुणा योगे च ये नृप |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
ज्ञानय़ोगेन महता तपसा च परन्तप ||
२१ ख