शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
सङ्कल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनञ्जय़ः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
सङ्कल्पमूलास्ते सर्वे सङ्कल्पो विषय़ात्मकः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
सङ्कल्पसिद्धः पुरुषः सङ्कल्पानधितिष्ठति ||
२७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
सङ्कल्पसिद्धा मर्त्यानामीप्सितैश्च मनोरथैः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
सङ्कल्पाज्जाय़ते कामः सेव्यमानो विवर्धते |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
सङ्कल्पाज्जाय़ते हर्षः शव्दादपि च जाय़ते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
सङ्कल्पादेव चैतेषामपत्यमुदपद्यत ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
सङ्कल्पाभिरुचिः कामः सनातनतमोऽनलः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्कल्पिताश्वमेधस्त्वं श्रुतधर्मश्च तत्त्वतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
सङ्कल्पेनाथ सोऽनेन दुष्प्रापेणाकृतात्मभिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
सङ्कल्पेषु निरारम्भो निराशो निर्ममो भव |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
सङ्कल्पो धर्मराजस्य निश्चय़ो मे तदाभवत् ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्कल्प्य तेषां कुल्यानि पुनः प्रत्यागमंस्ततः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
सङ्कल्प्य मनसा यज्ञं करन्धमसुतात्मजः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
सङ्कल्पय़ित्वा त्रीन्पिण्डान्स्वेनैव विधिना प्रभुः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्कारिका निष्कुटिका भ्रमा चत्वरवासिनी |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
सङ्कीर्णाचारधर्मेषु प्रतिलोमचरेषु च |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
सङ्कीर्णय़ोनिर्विप्रश्च सम्वन्धी पतितश्च यः |
४४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्कीर्त्य नामनी राजा ददौ दानमनुत्तमम् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
सङ्कुलं चाभवद्भूय़ो घोररूपं विशां पते ||
३६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
सङ्कुले वर्तमाने तु राजा धर्मसुतोऽव्रवीत् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
सङ्केते पिङ्गला वेश्या कान्तेनासीद्विनाकृता |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्कोच्याग्रकरान्भीताः प्रद्रवन्ति स्म वेगिताः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
सङ्क्रमा भेदिताः सर्वे नावश्च प्रतिषेधिताः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
शुक्र उवाच
सङ्क्रामय़िष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज |
४० क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्क्रुद्धं केशवं दृष्ट्वा पूर्वदेहेषु फल्गुनः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धः शकुनिं षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धमिव नर्दन्तं हिरण्यकशिपुं हरिः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धश्च महावीर्यो राक्षसेन्द्रं नरोत्तमः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धस्यान्तकस्येव को वेगं संसहेद्रणे ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
सङ्क्रुद्धाः समधावन्त अश्वग्रहणकाङ्क्षिणः ||
१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धान्पाण्डवानेको यद्दधारास्त्रतेजसा |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धान्यभ्यधावन्त विविधानि वय़ांसि च ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
सङ्क्रुद्धाश्च वराहं तं व्यकर्षन्त समन्ततः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
सङ्क्रुद्धो जामदग्न्यस्तु पुनरेव पतत्रिणः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धो नरशार्दूलो वेगेनाभिजगाम ह ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धो भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनस्तव ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धो भरतश्रेष्ठ भीष्मवाहुवलेरिताम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धो मद्रराजोऽभूच्छरवर्षं मुमोच ह ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्क्रुद्धो राक्षसस्तस्या भगिन्याः कुरुसत्तम |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धो राक्षसो घोरस्तत्रैवान्तरधीय़त ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धो वै महावाहुर्दण्डाहत इवोरगः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
११७
अकृतव्रण उवाच
सङ्क्रुद्धोऽतिवलः शूरः शस्त्रमादाय़ वीर्यवान् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
सङ्क्रुद्धय़ोर्महाघोरं प्रसक्तं कुरुसत्तम ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
सङ्क्रुध्यत्येकदा स्वामी स्थानाच्चैवापकर्षति |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
सङ्क्लिष्टकर्माणमतिप्रवादं; नित्यानृतं चादृढभक्तिकं च |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
सङ्क्षिपेच्च पुनः पार्थ सूर्यस्तेजोगुणानिव ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
सङ्क्षिपेच्च महामेरुं तूर्णमावर्तय़ेत्तथा ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
सङ्क्षिप्तमाय़ुर्विज्ञाय़ मर्त्यानां ह्रासि पाण्डव ||
९२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
सङ्क्षीणकर्मा पुरुषो रूपान्यत्वं निय़च्छति ||
८ ख