chevron_left  सङ्क्षेपतस्तपोवृद्धैःarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २७८
नारद उवाच
सङ्क्षेपतस्तपोवृद्धैः शीलवृद्धैश्च कथ्यते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
सङ्क्षेपतस्तु शीलस्य शृणु प्राप्तिं नराधिप ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्क्षेपतो वै स विशुद्धकर्मा; तेभ्यः समाख्याय़ दिवि प्रवेशम् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्षेपाद्द्वापरस्याथ ततः पुष्यं प्रवर्तते ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्क्षेपेण दुरात्मासौ न युक्तं त्वय़ि वर्तते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
सङ्क्षेपो नीतिशास्त्राणामविश्वासः परो मतः |
१८७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्षेपो वर्तते राजन्द्वापरेऽस्मिन्नराधिप |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्षेपो विस्तरश्चैव कर्ता कारय़िता च सः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
सङ्क्षोभश्चापि सत्त्वानामनावृष्टिकृतोऽभवत् |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्षोभ्य सलिलं वेगाद्गदामादाय़ वीर्यवान् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्षोभ्यमाणा द्रोणेन भिद्यमाना महाचमूः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्क्षय़ः सुमहानासीत्प्रजानामिति शुश्रुमः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
सङ्क्षय़े तु तथा भूते वर्तमाने महाभय़े |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
सङ्ख्यया भारताख्यानं कर्त्रा ह्यत्र महात्मना |
१९५ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
सङ्ख्यागणिततत्त्वज्ञैः सहस्राण्येकविंशतिः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
सङ्ख्याता वहुवृत्तान्ताः श्लोकाग्रं चात्र शस्यते |
१७७ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
सङ्ख्यातुं नैव शक्यानि कर्माणि पुरुषर्षभ |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
सङ्ख्यातोऽर्धरथः कर्णो द्विगुणः सन्नरर्षभः ||
३४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सङ्ख्यामतिगुणां चापि तेषु लोकेषु मोदते ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
सङ्ख्यास्यामि फलान्यस्य पश्यतस्ते जनाधिप |
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
सङ्ख्याय़मानोऽर्धरथः स कच्चि; त्त्वय़ा हतोऽद्याधिरथिर्दुरात्मा ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
सङ्ख्ये द्रोणरथं प्राप्य व्यनशन्कालचोदिताः ||
१०१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
सङ्गच्छ तैर्महावाहो मम चेदिच्छसि प्रिय़म् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्गच्छ भ्रातृभिः सार्धं मानं सन्त्यज्य पार्थिव ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्गतं भ्रातृभिश्चापि त्रिगर्तैश्च महारथैः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
सङ्गत्या जठरे न्यस्तं रेतोविन्दुमचेतनम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
सङ्गत्या तत्र भगवान्विष्णुरासीच्चतुर्भुजः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
सङ्गत्या धृतराष्ट्रश्च कुर्याद्धर्म्यं वचस्तव ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्गत्या भीमसेनस्तु तत्रास्ते पृथय़ा सह ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
सङ्गधर्मा भवत्येष निःसङ्गात्मा नराधिप ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्गमो नर्तनागारे यथावोचः परन्तप ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
सङ्गम्य षड्भिः पत्नीभिः सप्तर्षीणामिति स्म ह ||
२ ग
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्गम्य सा तु धर्मेण योगमूर्तिधरेण वै |
३ क
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्गम्य सूतपुत्रेण कर्णेनाहवशोभिना |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
सङ्गरेषु निपातेषु तथापद्व्यसनेषु च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सङ्गवान्यस्त्रिवर्गे च किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||
१२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
सङ्गागतं नरश्रेष्ठ भावैस्तामसराजसैः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
सङ्गात्सञ्जाय़ते कामः कामात्क्रोधोऽभिजाय़ते ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
सङ्गृहीतजनोऽस्तव्धः प्रसन्नवदनः सदा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
सङ्गृहीतमनुष्यश्च यो राजा राजधर्मवित् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
सङ्गृहीतमनुष्येण कृत्स्ना जेतुं वसुन्धरा ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
सङ्गृह्णन्तः परिजनं स्वाम्यर्थपरमाः सदा ||
२३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
सङ्गृह्णीय़ादनुरूपान्सहाय़ा; न्सहाय़साध्यानि हि दुष्कराणि ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
सङ्गृह्यमाणां तां दृष्ट्वा पाण्डवैर्वाहिनीं रणे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
सङ्गोप्य ह्यात्मनो द्वाराण्यपिधाय़ विचिन्तय़न् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
सङ्ग्रहं च त्रिवर्गस्य श्रेय़ आहुर्मनीषिणः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्ग्रहं विग्रहं चैव समुद्रोऽपि गदाधरौ |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
सङ्ग्रहः सर्वभूतानां दानं च मधुरा च वाक् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
सङ्ग्रहश्चैव भूतानां दानं च मधुरा च वाक् ||
४९ ख