chevron_left  सुरप्रवीरंarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
सुरप्रवीरं वीरं च सुकेशं च सुवर्चसम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
सुरभिस्रग्धराः सर्वे सुमृष्टमणिकुण्डलाः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
सुरभीं ससृजे व्रह्मामृतधेनुं पय़ोमुचम् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
सुरभीण्येकवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
सुरभ्यः सौरभेय़ाश्च सरितः सागरं यथा ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
सुरभ्याश्चैव संवादमिन्द्रस्य च विशां पते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
सुरम्यं कदलीषण्डं वहुय़ोजनविस्तृतम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
सुरम्यं दर्शय़ामासुरेकैकश्येन भारत ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
सुरम्यां विपुलच्छाय़ां नानाद्रुमलतावृताम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
सुरराज्येन विप्रर्षे देवैश्चात्र तपश्चितम् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
सुरर्षभा व्राह्मणसत्तमाश्च; तथा नृगाद्या नरदेवमुख्याः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ८३
यय़ातिरु उवाच
सुरर्षिगन्धर्वनरावमाना; त्क्षय़ं गता मे यदि शक्र लोकाः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
सुरर्षिदेवगन्धर्वा ये च देवपुरःसराः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
भीष्म उवाच
सुरर्षिर्नारदो राजन्सिद्धस्त्रैलोक्यसंमतः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
सुरर्षीणां श्रुतं मध्ये पृष्टश्चापि यथातथम् ||
११२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
सुरर्षीन्महतश्चान्यान्महर्षीन्सूर्यसंनिभान् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
सुरशत्रुममित्रघ्नस्त्रिलोकेश इवापरः |
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सुरसाजनय़न्नागान्राजन्कद्रूश्च पन्नगान् |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०१
नारद उवाच
सुरसाय़ाः सुता नागा निवसन्ति गतव्यथाः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
सुरहस्यमिदं प्रोक्तं देवानां भरतर्षभ |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
सुरा देवी समुत्पन्ना तुरगः पाण्डुरस्तथा ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
सुरा लवणमित्येव तिलान्केसरिणः पशून् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
सुराणां कार्यसिद्ध्यर्थं सहाय़ा वै भविष्यथ ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सुराणां चापि मेधावी व्रह्मचारी यतव्रतः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
गङ्गो उवाच
सुराणां संमतो नित्यमसुराणां च भारत |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सुराणां हितकामार्थमृषिं देवोऽभ्यभाषत ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
सुराणामपि यत्तानां पृतनासु न विभ्यति ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
सुराणामपि हन्तारं पञ्चैतानसृजत्तपः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
सुराणामसुराणां च यथा वीर प्रजापतिः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
सुराणामसुराणां च सङ्ग्रामः सुमहानभूत् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
सुराणामसुराणां च समजाय़त वै मिथः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
सुराणामसुराणां च सर्वघोरतरो महान् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
सुरादीनामहं सम्यग्लोकानां प्रभवाप्ययम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
सुरानुगतमुच्छिष्टमभोज्यं शेषितं च यत् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
सुरानृषींश्च क्लिश्नाति वधस्तस्य विधीय़ताम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
सुरापानं च कुर्यात्स यो हन्याच्छरणागतम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
सुरापानं व्रह्महत्या गुरुतल्पमथापि वा |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
सुरापानं सकृत्पीत्वा योऽग्निवर्णां पिवेद्द्विजः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
सुरापानाद्वञ्चनां प्रापय़ित्वा; सञ्ज्ञानाशं चैव तथातिघोरम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
सुरापाने च सक्तानां व्राह्मणानां दुरात्मनाम् |
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
सुरापो निय़ताहारो व्रह्मचारी क्षमाचरः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
सुरापो वारुणीमुष्णां पीत्वा पापाद्विमुच्यते |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
सुरापो व्रह्महा क्षुद्रश्चौरो भग्नव्रतोऽशुचिः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
सुरापो व्रह्महा स्तेय़ी भ्रूणहा गुरुतल्पगः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
सुरापोऽसंमतादाय़ी भ्रूणहा गुरुतल्पगः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५५
भीष्म उवाच
सुरापोऽसंमतादाय़ी भ्रूणहा गुरुतल्पगः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
सुरामाहारय़ामास राजार्हां सुपरिस्रुताम् ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
सुरामैरेय़पानानि प्रभूतान्यभ्यहारय़न् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
सुरामैरेय़मिश्रेण भक्ष्यभोज्येन चैव ह |
१२ क