वन पर्व
अध्याय
१०१
विष्णुरु उवाच
विदितं मे सुराः सर्वं प्रजानां क्षय़कारणम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
विदितं मे सुराः सर्वं यद्वः कार्यं चिकीर्षितम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
विदितं मे हृषीकेश यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
विदितं वाथ वाज्ञातं पितुर्मे संविधीय़ताम् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
विदितं वेदितव्यं ते कर्तव्यमपि ते कृतम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
युधिष्ठिर उवाच
विदितं वेदितव्यं ते कस्मान्मामनुपृच्छसि ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
विदितं वेदितव्यं ते न शोकं कर्तुमर्हसि ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
विदितं वेदितव्यं ते स्थित्यर्थमनुपृच्छसि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
जनक उवाच
विदितं सर्वमेतत्ते पाणावामलकं यथा ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
विदितं हि तवाप्येतत्पूर्वस्मिन्देहधारणे ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
विदितं ह्येव ते सर्वं वेदितव्यमरिन्दम ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
विदितः पाण्डवेय़ानां वासुदेवप्रिय़ेप्सय़ा |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
विदितः पुत्र रामस्ते यतस्त्वं योद्धुमिच्छसि ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
विदितश्चाभवत्तस्य राक्षसेन्द्रस्य धीमतः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
विदितश्चैव ते धर्मः सततं चरितश्च ते |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
विदितस्ते महाप्राज्ञ त्वं हि व्रह्ममय़ो निधिः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
विदितस्त्वं हि देवानामृषीणां च महात्मनाम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
विदिता ते महावाहो धर्माणां परमा गतिः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
विदिता ते सदा वुद्धिर्भीमस्य न स शाम्यति |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
विदिता हास्तिनपुरं प्रत्याजग्मुररिन्दमाः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
विदिता हि हरेर्यूय़मिहाय़ाताः कुरूद्वहाः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
विदिताः क्षत्रधर्मास्ते येषां युद्धेन जीविका |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
विदिताः सर्व एवेह धर्मास्तव युधिष्ठिर |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
विदिताः सर्वधर्मास्ते स्थित्यर्थमनुपृच्छसि |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
विदिताश्च कुवेरस्य ततस्ते नरपुङ्गवाः |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
विदितास्तव धर्मज्ञ देवदानवराक्षसाः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
भीष्म उवाच
विदितास्ते स्त्रिय़ो याश्च यादृशाश्च स्वभावतः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
विदितास्त्रस्ततः कर्णो रममाणोऽऽश्रमे भृगोः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
विदिते चापि वक्तव्यं सुहृद्भिरनुरागतः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
विदिते चास्य कुर्वीत कार्याणि सुलघून्यपि |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
विदिते धृतराष्ट्रस्य धार्तराष्ट्रो न संशय़ः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
भीम उवाच
विदिते व्यवसिष्यामि यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
विदितो देवदेवेश प्रागेवासि मम प्रभो |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
विदितो धृतराष्ट्रस्य सोऽवतीर्य रथोत्तमात् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
विदितो भगवानस्य कार्यमागमने च यत् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
विदितो मेऽसि दुर्धर्ष नारदाद्देवलात्तथा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
विदितो यस्तु मार्गो मे हितार्थं शृणु तं मम ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
विदितो राक्षसेन्द्रस्य प्रविवेश गतव्यथः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
शक्र उवाच
विदितोऽहं रवेः पूर्वमाय़न्नेव तवान्तिकम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२३५
चित्रसेन उवाच
विदितोऽय़मभिप्राय़स्तत्रस्थेन महात्मना |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
विदितौ हि तवात्यन्तं क्रुद्धाविव यथान्तकौ |
८० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
विदितौ हि तवात्यन्तं क्रुद्धाविव यमान्तकौ |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१४८
कुन्त्यु उवाच
विदित्वा अपकर्षेय़ं शक्यं चेदपकर्षितुम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
विदित्वा च दृढां शक्रस्तां शुके शीलसम्पदम् |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिना ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
विदित्वा चान्वतिष्ठन्त क्षेत्रज्ञेनानुदर्शितम् ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
विदित्वा चान्वपद्यन्त क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिनः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
विदित्वा चापरे भिन्नानन्तरेषु पतन्त्यथ |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
विदित्वा चास्य सङ्कल्पमिदं वचनमव्रवीत् ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
विदित्वा परमास्त्राणि क्षत्रधर्मव्रते स्थितः |
१४ क