अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
सुप्रतीता विनीता च सा नारी धर्मभागिनी ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्रतीतैस्तदा विप्रैः स्वागमैः सुस्वनैर्नृप |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
सुप्रदर्शा वनवती चित्रधातुविभूषिता |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्रभं च महात्मानं शुभकर्माणमेव च |
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
सुप्रभं सानुनादं च सुप्रशस्तनिवेशनम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसह्रदा |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्रभा नाम राजेन्द्र नाम्ना तत्र सरस्वती ||
१२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
भीष्म उवाच
सुप्रभां नाम वै नाम्ना रूपेणाप्रतिमां भुवि |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
दारुक उवाच
सुप्रभातामिमां रात्रिं जय़ाय़ विजय़स्य हि ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
सुप्रभिन्नाः प्रभिन्नानां संमुखाभिमुखा यय़ुः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्रवृत्तैस्त्रिभिर्ह्येतैर्धर्मैः सूय़न्ति वै प्रजाः ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
सुप्रसन्नमना वीर कुरुष्वैनं प्रदक्षिणम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
सुप्रसन्नमुखी भर्तुर्या नारी सा पतिव्रता ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
सुप्रसन्नस्तु भावेन योगेन च नराधिप |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
सुप्रसन्ना हि ते देवा यत्ते धर्मे रता मतिः |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
सुप्रिय़ः सर्वलोकस्य भविष्यसि जनार्दन ||
३६ ग
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्रिय़ा चातिवाहुश्च विख्यातौ च हहाहुहू |
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
सुप्रिय़ैर्विप्रय़ोगश्च सम्प्रय़ोगस्तथाप्रिय़ैः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्रीतः पुरुषव्याघ्र सर्वान्पुत्रानुपासतः ||
२८ ग
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
सुप्रीताः परितुष्टाश्च तेऽप्याशंसन्त्यरिक्षय़म् ||
३९ ग
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
सुफलश्चित्रकोशश्च किङ्किणीसाय़को महान् |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
सुफलश्चित्रकोशश्च हेमत्सरुरनुत्तमः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
सुभगं चार्थवन्तं च रूपवन्तं च पश्यति ||
१३९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
सुभगा खलु कौसल्या यस्याः पुत्रोऽभिषेक्ष्यते |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
सुभगा दर्शनीय़ाङ्गी वेदिमध्या मनोरमा ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
सुभगा भोगसम्पन्ना यज्ञपत्नी स्वनुव्रता ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
सुभगा लम्विनी लम्वा वसुचूडा विकत्थनी ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
सुभगे नाभ्यसूय़ामि वाक्यस्यास्य तवानघे ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
सुभगे पञ्चहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
सुभगे सप्तहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
सुभगो दर्शनीय़श्च यशोभागी च जाय़ते ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रा कृष्णभगिनी तच्चापि विदितं मम ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रा तु तमुत्क्रान्तमात्मजस्य वधं रणे |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रा त्वथ शैलेन्द्रमभ्यर्च्य सह रैवतम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सुभद्रा पुत्रशोकार्ता विललाप सुदुःखिता ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रा युय़ुजे प्रीता पाण्डवेनार्जुनेन ह ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सुभद्रा वक्ष्यते किं मामभिमन्युमपश्यती |
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रा सुषुवे वीरमभिमन्युं नरर्षभम् ||
५९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रां च यथान्याय़ं याश्चान्याः कुरुय़ोषितः ||
२ ग
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रां त्वरमाणश्च रक्तकौशेय़वाससम् |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रां द्रौपदीं चैव सभाजय़त केशवः ||
५२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रां भीमसेनं च फल्गुनं यमजौ तथा |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
सुभद्रां वा महाभागां प्रिय़ं पुत्रमपश्यतीम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्राद्याश्च ताः सर्वा भरतानां स्त्रिय़स्तथा |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य काञ्चनम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
७९
सहदेव उवाच
सुभद्रामाजहारैको वासुदेवस्य संमते ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
सुभद्राहरणादूर्ध्वं ज्ञेय़ं हरणहारिकम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सुभद्राय़ां च सम्भूतो नैवं वक्तुमिहार्हति ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सुभद्राय़ाः प्रिय़ं नित्यं द्रौपद्याः केशवस्य च |
२७ क