आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
शार्ङ्गिकां शार्ङ्गको भूत्वा जरितां समुपेय़िवान् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
शार्ङ्गेण च महावाहुः संमितं दिव्यमक्षय़म् ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
शार्दूल इव सिंहेन भीमसेनेन पातितः ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
शार्दूलः पिशिताकाङ्क्षी गृहीत्वेव महामृगम् ||
५८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२१
गान्धार्यु उवाच
शार्दूलमिव सिंहेन समरे सव्यसाचिना |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
शार्दूलवचनं श्रुत्वा शार्दूलजननी ततः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
शार्दूलस्तत्र गोमाय़ुं स्नेहात्प्रस्रुतलोचनः |
७० क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाभिमर्शति ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
शार्दूलावामिषप्रेप्सू पराक्रान्ताविवाहवे ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
शार्दूलाविव चान्योन्यमत्यर्थं च ह्यगर्जताम् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
उत्तर उवाच
शार्दूलेनेव मत्तेन मृगास्तृणचरा वने ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
शार्दूलेष्वथ धर्मज्ञ श्रमो ज्वर इहोच्यते |
५४ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
शार्दूलैर्महिषैः सिंहैरागारे युध्यसे यदा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
शार्दूलो देवराजस्य माय़यान्तर्हितस्तदा ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
शार्दूलोऽभिमुखः प्रैति पृच्छाम्येनमशङ्किता ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
शालग्राम इति ख्यातो विष्णोरद्भुतकर्मणः ||
१०६ ग
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
शालतालकदम्वैश्च वकुलैश्च सकेतकैः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
शालतालधवाश्वत्थत्वचागुरुवनैस्तथा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
शालपुष्पमय़ीं दिव्यां वृसीं समुपकल्पय़त् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
शालभा यत्र सौवर्णास्तपनीय़विचित्रिताः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
६१
वृहदश्व उवाच
शालवेणुधवाश्वत्थतिन्दुकेङ्गुदकिंशुकैः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
शालस्कन्धनिकाशानि क्षत्रिय़ाणां महामृधे ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
शालस्कन्धप्रतीकाशमिन्द्राशनिसमस्वनम् |
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
शालस्कन्धो महावाहुस्त्वां स्वजानो वृकोदरः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
शालांस्तालांस्तमालांश्च प्रिय़ालान्वकुलांस्तथा |
४६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
शालावृकगणैश्चैव भक्षय़िष्यद्भिरन्तिकात् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
शालावृका इति ख्यातास्त्रिषु लोकेषु भारत |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
शालावृका इवाजस्रं जिघांसूनिव विन्दति |
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
शालावृकाणां प्रेतानां भुरुण्डानां च सर्वशः ||
४३ ग
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
शालिप्रसूनसदृशैः शिरीषकुसुमप्रभैः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
शालिहोत्रस्य राजेन्द्र शालिशूर्पे यथाविधि |
९० क
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
शालिहोत्रोऽथ किं नु स्याद्धय़ानां कुलतत्त्ववित् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
शालेन जघ्निवान्मूर्ध्नि वलेन कपिकुञ्जरः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
शाल्मलं चैव तत्त्वेन क्रौञ्चद्वीपं तथैव च |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
शाल्मलीः किंशुकाशोकाञ्शिंशपांस्तरलांस्तथा ||
४६ ग
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
शाल्वं निवारय़िष्येऽहं तिष्ठ त्वमिति सूतज ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
शाल्वमेवाभिदुद्राव विधास्यन्कलहं नृप ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अम्वो उवाच
शाल्वराजगतं चेतो मम पूर्वं मनीषितम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
शाल्वराजविनाशाय़ प्रय़ातं मां निवोधत ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
शाल्वराजो नरश्रेष्ठः समवाकिरदाशुगैः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
शाल्वराजो महाराज भीमसेनेन पातितः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
शाल्वराजो महावाहुरमर्षेणाभिचोदितः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
शाल्ववाणार्दिते तस्मिन्प्रद्युम्ने वलिनां वरे |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अकृतव्रण उवाच
शाल्वस्त्वां शिरसा भीरु गृह्णीय़ाद्रामचोदितः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
शाल्वस्य नगरं सौभं गतोऽहं भरतर्षभ |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
शाल्वस्याहमिति प्राह पुरा मामिह भार्गव |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शाल्वा मत्स्याः केकय़ाश्चापि सर्वे; गजानीकैर्भ्रातरो योत्स्यमानाः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शाल्वा मत्स्यास्तथाम्वष्ठास्त्रिगर्ताः केकय़ास्तथा |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
शाल्वाः संशप्तकाश्चैव नाराय़णवलं च यत् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
शाल्वाश्रय़ास्त्रिगर्ताश्च अम्वष्ठाः केकय़ैः सह |
११० क