स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
वितुद्यमानं विहगैर्वहुभिर्माधवान्तिके ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
वितुद्यमानं विहगैर्विराटमसितेक्षणाः |
३० क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
वितुद्यमानं विहगैस्तं भार्याः प्रत्युपस्थिताः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
वितुद्यमानस्तैश्चापि गान्धारैः पाण्डवर्षभः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
वितुन्नाङ्गं शरशतैर्न्यस्ताय़ुधमसृक्क्षरम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
वित्तं यच्चान्यदप्याहुर्न प्रत्याख्यासि कर्हिचित् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
९६
अगस्त्य उवाच
वित्तकामानिह प्राप्तान्विद्धि नः पृथिवीपते |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
९६
अगस्त्य उवाच
वित्तकामाविह प्राप्तौ विद्ध्यावां पृथिवीपते |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
वित्तक्षय़े हीनसुखोऽतिवेलं; दुःखं शेते कामवेगप्रणुन्नः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
वित्तत्यागं दक्षिणानां च यज्ञे; सम्यग्ज्ञानं पावनानीति विद्यात् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
वित्तानि धर्मलव्धानि क्रतुमुख्येष्ववासृजन् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
९६
अगस्त्य उवाच
वित्तार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां पृथिवीपते |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
वित्तेन कथितेनान्ये वलेनान्येऽनुमान्य च ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
वित्तोपनय़ने तात चकार गमने मतिम् ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
वित्रस्तमनसः सर्वे धनञ्जय़कृताद्भय़ात् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
वित्रस्ता दैत्यनार्यस्ताः स्वानि वेश्मान्यथाविशन् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
वित्रस्ता वहुला सेना भारती प्रतिभाति मे ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
वित्रस्ताः प्रणमामेह भय़ादपि शतक्रतोः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
वित्रस्तानि च सर्वाणि शकृन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
वित्रस्तास्तावका राजन्प्रदुद्रुवुरनेकधा ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
वित्रस्तोद्भ्रान्तनय़ना गङ्गा विप्लुतलोचना |
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
वित्रासं च जगामाथ तं दृष्ट्वा शरसङ्क्षय़म् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
वित्रास्य सेनां ध्वजिनीपतीनां; सिंहो मृगाणामिव यूथसङ्घान् |
१२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
वित्रास्यमानाः सुकृतो न कामाद्घ्नन्ति दुष्कृतीन् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
वित्रास्यमानो वहुशो व्रह्मा ताभ्यां महाय़शाः |
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
वित्रासय़न्तौ तव पुत्रसेनां; युधिष्ठिरं नन्दय़तः स्म वीरौ ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
वित्रासय़न्राजति वाहमुख्ये; शाल्वस्य सेनाप्रमुखे ध्वजाग्र्यः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
वित्रासय़ित्वा तत्सैन्यं द्रावय़ित्वा महारथान् |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
३४
उत्तर उवाच
वित्रासय़ित्वा सङ्ग्रामे दानवानिव वज्रभृत् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
वित्रासय़ेतामथ तौ व्रह्माणममितौजसम् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वित्रेसुः पाण्डवभय़ाद्रजोध्वस्तास्तथा भृशम् ||
६६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
वित्रेसुः सर्वतः सूता विषादभय़कम्पिताः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
वित्रेसुः सर्वभूतानां शव्दमेवापरेऽव्रजन् ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
वित्रेसुः सर्वभूतानि क्षय़ं प्राप्तं च मेनिरे ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
वित्रेसुः सर्वभूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
वित्रेसुः सर्वभूतानि श्रुत्वा सर्वे च पार्थिवाः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
वित्रेसुर्मागधाः सर्वे स्त्रीणां गर्भाश्च सुस्रुवुः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
वित्रेसुश्च निलिल्युश्च भूतानि सुमहान्त्यपि ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
वित्रेसुस्तावकाः सर्वे शल्यस्त्वेनं समभ्ययात् ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
वित्रेसुस्तावकाः सैन्याः शकृन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः |
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
विदधाति नित्यमजितोऽतिवलो; गतिमात्मगां सुकृतिनामृषिणाम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
विदधाति विभज्येह फलं पूर्वकृतं नृणाम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
विदधे कौरवो राजा वहुरत्नां मनोरमाम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
विदन्ति चैनं देवाश्च स्वश्चैवान्तरपूरुषः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
विदन्त्यसुरमाय़ां ये सुघोरा घोरचक्षुषः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
६१
वृहदश्व उवाच
विदर्भतनय़ा राजन्विललाप सुदुःखिता |
११ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
विदर्भनगरीं गत्वा दमय़न्त्यास्तदान्तिके |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
विदर्भराजतनय़ां दमय़न्तीति विद्धि माम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
विदर्भराजदुहिता दमय़न्तीति विश्रुता |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
५८
दमय़न्त्यु उवाच
विदर्भराजस्तत्र त्वां पूजय़िष्यति मानद |
३४ क