अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
हंसः परमहंसश्च यो यः पश्चात्स उत्तमः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
हंसकाकीय़माख्यानमत्रैवाक्षेपसंहितम् ||
१७० ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
हंसकारण्डवोद्गीताः सारसाभिरुतास्तथा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
हंसकारण्डवोद्धूतैः सृजद्भिरमलं रजः ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
हंसकारण्डवय़ुताश्चक्रवाकोपशोभिताः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
हंसकारण्डवय़ुतैश्चक्रवाकोपशोभितैः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
हंसकुन्देन्दुसदृशं मृणालकुमुदप्रभम् |
१०६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
हंसगद्गदभाषिण्यो दुःखशोकप्रमोहिताः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
हंसचन्द्रप्रतीकाशां नन्दिनीं तां जहार गाम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८८
वैशम्पाय़न उवाच
हंसचन्द्रांशुसङ्काशं गृहमस्य न्यवेदय़त् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
हंसजः पङ्कदिग्धाङ्गः समुद्रोन्मादनश्च ह |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
हंसमालापरिक्षिप्तं नागवीथीसमाकुलम् |
५३ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
हंसवत्त्वमपीदानीं ज्ञातिभ्यः प्राप्नुय़ा वधम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
हंसवन्नेदुषां राजन्द्विजानां तत्र भारती |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
हंसवर्णाः प्रविविशुर्वहन्तः कृष्णपाण्डवौ ||
८६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
हंसवर्णान्हय़ाग्र्यांस्तान्प्रैषीद्यत्र वृकोदरम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
हंसवर्णान्हय़ान्भूय़ः प्राहिणोद्यत्र पाण्डवः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
हंससारसय़ुक्तेन किङ्किणीजालमालिना |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
हंससारसय़ुक्तेन विमानेन स गच्छति |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
हंसस्तु मृदुकेनैव विक्रान्तुमुपचक्रमे |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
हंसस्य पतितं काको वलवानाशुविक्रमः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
हंसा इव च नर्दन्तः प्रशशंसुर्युधिष्ठिरम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
हंसा इव महाराज शरत्काले नभस्तले ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
हंसा हिमवतः पृष्ठे वारिविप्रहता इव ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
हंसा हिमवतः प्रस्थे पिवन्त इव मेदिनीम् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
हंसांशुवर्णसदृशानाय़ोजनसुदर्शनान् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
हंसांश्चावहसन्ति स्म प्रावदन्नप्रिय़ाणि च |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
हंसांसगौरास्ते सेनां हंसाः सर इवाविशन् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
हंसाच्छवर्णैर्वहुभिराय़ोजनसुगन्धिभिः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
हंसादिभिः सुवहुभिर्विविधैः पक्षिभिर्वृताम् |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
हंसानां वचनं यत्तत्तन्मां दहति पार्थिव |
३ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
हंसानां वचनं श्रुत्वा यथा मे नैषधो वृतः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
हंसान्सुमधुरांश्चापि तत्र शुश्राव पार्थिवः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
हंसारावैः कोकरवै रवैरन्यैश्च पक्षिणाम् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
हंसाश्च शतपत्राश्च सारसाश्च सहस्रशः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
हंसि राक्षसवद्यस्माद्राजापसद तापसम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
हंसैरिव महावेगैरन्योन्यमभिदुद्रुवुः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
भीष्म उवाच
हंसो भूत्वाथ सौवर्णस्त्वजो नित्यः प्रजापतिः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
हंसो यथा मेघमिवापतन्तं; धनञ्जय़ः प्रत्यपतत्तरस्वी ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
हंसो हय़शिराश्चैव प्रादुर्भावा द्विजोत्तम |
९४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
हंसोक्तं चाक्षरं चैव कूटस्थं यत्तदक्षरम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
भीष्म उवाच
हंहो वेदा यदि मता धर्माः केनापरे मताः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
हठो वा वर्तते लोके कर्मजं वा फलं स्मृतम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
हत एव नृशंसेन पिता तव नरर्षभ ||
१२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
हत द्रोणं हत द्रोणमिति ते द्रोणमभ्ययुः |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
हत द्रोणं हत द्रोणमित्यासीत्तुमुलं महत् ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
हत प्रहरताभीता विध्यत व्यवकृन्तत |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
हत विध्यत गृह्णीत प्रहरध्वं निकृन्तत |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
हत विध्यत गृह्णीत प्रहरध्वं निकृन्तत |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
हतं तं मन्यमानाः स्म प्राणदन्कुरुपुङ्गवाः ||
५७ ग