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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
हनुरेका जगतीस्था तथैका; दिवं गता महतो दानवस्य |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
हनुरेका स्थिता तस्य भूमावेका दिवं गता ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
च्यवन उवाच
हनुस्तस्याभवद्भूमावेकश्चास्यास्पृशद्दिवम् ||
२४ ग
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
हनूमत्प्रमुखाश्चापि विश्रान्तास्ते प्लवङ्गमाः |
३० क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
हनूमत्प्रमुखास्ते तु वानराः पूर्णमानसाः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
हनूमन्नीलतारैश्च नलेन च कपीश्वरः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
हनूमांश्च महासत्त्व ईषदुन्मील्य लोचने |
७३ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
हनूमाञ्जाम्ववांश्चैव ससैन्याः पर्यवारय़न् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
हनूमान्वाय़ुतनय़ो वाय़ुपुत्रमभाषत ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ९५
अगस्त्य उवाच
हन्त गच्छाम्यहं भद्रे चर काममिह स्थिता ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
हन्त तस्मान्महावाहो वधोपाय़ं वदात्मनः |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि कथामतिमनोरमाम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि कथामेतां मनोरमाम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतय़ः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि नमस्कृत्वा कपर्दिने |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि नमस्कृत्वा स्वय़म्भुवे |
९ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि नमस्कृत्वा स्वय़म्भुवे |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि नामानीह मनीषिणाम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि नीतिमापत्सु भारत |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि पुरावृत्तं महाद्युते |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि |
४ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि यन्मे पृष्टः पुरा गुरुः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि येन श्रेय़ः प्रपत्स्यसे |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि यय़ातेरुत्तरां कथाम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि शृणु राजन्युधिष्ठिर |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
हन्त ते कथय़िष्यामि शृण्वानस्य जनाधिप |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
हन्त ते वर्णय़िष्यामि यथावृत्तं महारणे |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
हन्त ते वर्णय़िष्यामि सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
हन्त ते वर्तय़िष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
हन्त ते वर्तय़िष्यामि पुराणं पाण्डुनन्दन |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
हन्त ते वर्तय़िष्यामि यथावद्भरतर्षभ |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
हन्त ते वर्तय़िष्येऽहमितिहासं पुरातनम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि यदेतदनुपृच्छसि |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि विमर्दमतिदारुणम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् |
१ क
वन पर्व
अध्याय १९६
मार्कण्डेय़ उवाच
हन्त ते सर्वमाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि देवि कर्मफलोदय़म् |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि मुनिधर्ममनुत्तमम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि यदृषीणां पराय़णम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि शृणु कार्यैकनिश्चय़म् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि सङ्ग्रामं लोमहर्षणम् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ३९
अर्जुन उवाच
हन्त तेऽहं समाचक्षे दश नामानि यानि मे |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
हन्त धर्मान्प्रवक्ष्यामि दृढे वाङ्मनसी मम |
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११४
वृहस्पतिरु उवाच
हन्त निःश्रेय़सं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
हन्त पृच्छामि तस्मात्त्वां पितामह नमोऽस्तु ते |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
हन्त पृच्छामि ते तस्मादाचार्य शृणु मे वचः |
६८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
हन्त वः सम्प्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छथ सत्तमाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
हन्त वक्ष्यामि ते पार्थ ध्यानय़ोगं चतुर्विधम् |
१ क