शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
धर्माभिचारिणः पापाश्चारा लोकस्य कण्टकाः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
धर्मारण्यं हि तत्पुण्यमाद्यं च भरतर्षभ |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
व्राह्मण उवाच
धर्मारण्यं हि मां विद्धि नागं द्रष्टुमिहागतम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
धर्मारामा धर्मसुखाः कृत्स्नव्यवसितास्तथा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
धर्मारामान्धर्मपरान्ये न रक्षन्ति मानवान् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
धर्मारामामर्थवतीमहिंस्रा; मेतां वाचं तव जानामि सूत ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मारामो ह्रीनिषेधस्तरस्वी; कुन्तीपुत्रः पाण्डवोऽजातशत्रुः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
धर्मार्जितधनक्रीतान्स लोकानश्नुतेऽक्षय़ान् ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
धर्मार्थं च द्विजातिभ्यो दीय़ते मधुसर्पिषी ||
१०६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
युधिष्ठिर उवाच
धर्मार्थं न सुखार्थार्थं कथं यज्ञः समाहितः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
धर्मार्थं न्याय़मुत्सृज्य न तत्कल्याणमुच्यते ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
धर्मार्थं युध्यमानस्य मामकान्तरमाविशः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
युधिष्ठिर उवाच
धर्मार्थं रोचय़े राज्यं धर्मश्चात्र न विद्यते ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
अरुन्धत्यु उवाच
धर्मार्थं सञ्चय़ो यो वै द्रव्याणां पक्षसंमतः |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थकामकार्याणां कार्याणामिव निग्रहे ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
धर्मार्थकामकुशलो धर्मार्थावप्यपीडय़न् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
धर्मार्थकामज्ञमुपेत्य पृच्छे; द्युक्तो गुरुं व्राह्मणमुत्तमार्थम् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
धर्मार्थकाममोक्षाश्च सकला ह्यत्र शव्दिताः ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
धर्मार्थकाममोक्षेषु प्रतिज्ञाय़ विशेषतः |
८४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
धर्मार्थकामसंय़ुक्तं त्रिवेणुं चापि वन्धुरम् |
७० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
धर्मार्थकामसंय़ोगं सोऽमुत्रेह च विन्दति ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
धर्मार्थकामहीनाश्च ते भवन्त्यसुखान्विताः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
युधिष्ठिर उवाच
धर्मार्थकामाः किंमूलास्त्रय़ाणां प्रभवश्च कः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थकामाः सममेव सेव्या; यस्त्वेकसेवी स नरो जघन्यः |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
राम उवाच
धर्मार्थकामान्योऽभ्येति सोऽत्यन्तं सुखमश्नुते ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थकामय़ुक्ताश्च विचित्रार्थपदाक्षराः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
धर्मार्थकामय़ुक्तोऽपि नालं मन्त्रं परीक्षितुम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
युधिष्ठिर उवाच
धर्मार्थकुशल प्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
६९
विदुर उवाच
धर्मार्थकुशला चैव द्रौपदी धर्मचारिणी ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
धर्मार्थगुणय़ुक्तेन नेतरेण कथञ्चन |
८ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
धर्मार्थमेव ते राज्यं धर्मार्थं जीवितं च ते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
धर्मार्थमोक्षसंय़ुक्तमितिहासमिमं शुभम् |
११७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थव्यवहाराङ्गैस्तस्मै सत्यात्मने नमः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
धर्मार्थशास्त्रतत्त्वज्ञः सन्धिविग्रहको भवेत् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
धर्मार्थसहितं वाक्यं भगवन्ननुशाधि माम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थसहितं वाक्यमुभय़ोः पक्षय़ोर्हितम् |
५७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थसहितं श्लक्ष्णं तत्त्वतश्च सहेतुमत् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थसहिता वाचः श्रोतुमिच्छाम माधव |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
धर्मार्थहेतोः क्षमते तितिक्षा क्षान्तिरुच्यते |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मार्थाभ्यां कर्म कुर्वन्ति नित्यं; सुखप्रिय़ा नानुरुध्यन्ति कामान् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थावखिलौ हित्वा वनं मौढ्यात्प्रतिष्ठसे ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
धर्मार्थावध्रुवौ तस्य योऽपशास्त्रपरो भवेत् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थावनुरुध्यन्ते त्रिवर्गासम्भवे नराः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
धर्मार्थावन्नतो विद्धि रोगनाशं तथान्नतः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थावभिसन्त्यज्य संरम्भं योऽनुमन्यते |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थिनं तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशय़ेत् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
धर्मार्थी प्राप्नुय़ाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुय़ात् |
१२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
राम उवाच
धर्मार्थौ धर्मकामौ च कामार्थौ चाप्यपीडय़न् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थौ पृष्ठतः कृत्वा प्रचरन्ति नृशंसवत् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
धर्मार्थौ यः परित्यज्य स्यादिन्द्रिय़वशानुगः |
६० क