उद्योग पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
ध्रुवं युधि हतास्तेन भक्षय़िष्याम पांसुकान् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवं युधिष्ठिरं सङ्ख्ये सानुवन्धं सवान्धवम् |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवं येय़मधर्मे मे प्रवृत्ता कलुषा मतिः |
३० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं लोकानवाप्तोऽय़ं नृपो वाहुवलार्जितान् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
ध्रुवं वानरराजस्य विदितो रावणालय़ः ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
ध्रुवं विदुरवाक्यानि धक्ष्यन्ति हृदय़ं मम |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
ध्रुवं विनाशः समरे पुत्राणां मम सञ्जय़ ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां; न वै श्रेय़ो धृतराष्ट्रः परैति |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं विनाशो युद्धे हि क्षत्रिय़ाणां प्रदृश्यते ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं विवाहकरणमास्थास्यामि विधानतः ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं विसञ्ज्ञा पतिता पृथिव्यां; सा शेष्यते शोककृशाङ्गय़ष्टिः ||
२४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
ध्रुवं वै व्राह्मणे सत्यं ध्रुवा साधुषु संनतिः |
५४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं शस्त्रजिताँल्लोकान्प्राप्तास्यमरवद्विभो ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवं स तेन हन्तव्य इत्यमन्यत पार्थिवः |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
शल्य उवाच
ध्रुवं सङ्कथय़िष्यामि योद्धुकामस्य संय़ुगे ||
३० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं सम्प्राप्य लोकांस्ते निर्मलाञ्शस्त्रनिर्जितान् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवं सर्वान्सोऽभ्यतीय़ादमित्रा; न्सेन्द्रान्देवान्मानुषे नास्ति चिन्ता ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
ध्रुवं सीता समालक्ष्य त्वां रामं चोदय़िष्यति |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
ध्रुवः प्रज्वलितो घोरमपसव्यं प्रवर्तते |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
ध्रुवः सप्तर्षय़श्चैव भुवनाः सप्त एव च ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवः सर्वाणि भूतानि विष्णुर्लोकाञ्जनार्दनः ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
ध्रुवद्वारभवां गङ्गां जगामावततार च ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवमत्र जलस्थाय़ो महानिति मतिर्मम ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३०
दुर्योधन उवाच
ध्रुवमस्मत्सहाय़ास्ते भविष्यन्ति प्रधानतः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
ध्रुवमात्मजय़ं मत्वा प्रत्याह पृथिवीपतिम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवमास्थाय़ वीभत्सुरुत्तमास्त्राणि संय़ुगे |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवमेषु निमित्तेषु भूमिमावृत्य पार्थिवाः |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
ध्रुवमेष्यति भीमोऽय़ं निहत्य पुरुषादकम् ||
२६ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवमेष्यति सङ्ग्रामे वधाय़ैवात्मनो नृपः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
ध्रुवस्तत्र जय़ः कर्ण यत्र युद्धविशारदौ |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
ध्रुवस्तस्य जय़स्तात यथेन्द्रस्य जय़स्तथा ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवस्तस्य जय़ो युद्धे भवेदिति मतिर्मम ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
द्रोण उवाच
ध्रुवस्ते विजय़ो राजन्यस्य मन्त्री हरिस्तव |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवस्य पुत्रो भगवान्कालो लोकप्रकालनः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
ध्रुवस्यौत्तानपादस्य व्रह्मर्षीणां तथैव च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
ध्रुवाणि पुरुषव्याघ्रे लोकपालसमे नृपे ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
भीष्म उवाच
ध्रुवाय़ नन्दिने होत्रे गोप्त्रे विश्वसृजेऽग्नय़े |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवो जय़ः पाण्डवानामिति मे निश्चिता मतिः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवो जय़ः पाण्डवानामितीदं; न संशय़ः कश्चन विद्यतेऽत्र |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
ध्रुवो जय़ो मे नित्यं स्यात्परत्र च परा गतिः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवो हि तेषां वार्ष्णेय़ येषां तुष्टोऽसि माधव ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
ध्वंस पाप परिभ्रष्टः क्षीणपुण्यो महीतलम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
ध्वंसय़ामास वार्ष्णेय़ो लाघवेन महाय़शाः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
ध्वंसय़िष्यति ते सेनां पाण्डवेय़हिते रतः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
ध्वजं कुरुपतेश्छिन्नं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
ध्वजं कुरुपतेश्छिन्नं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
ध्वजं केसरिणं चास्य चिच्छेद विशिखैस्त्रिभिः |
७० क
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
ध्वजं च चक्रे भगवानुपरि स्थास्यसीति तम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
ध्वजं च त्वरितं छित्त्वा रथाद्भूमावपातय़त् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
ध्वजं च दृष्ट्वा पार्थस्य सर्वान्नो भय़माविशत् ||
२ ख