सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरस्य मतं ज्ञात्वा धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरस्य महातेजा दुर्योधनकृतं स्मरन् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरस्य वचः श्रुत्वा नोचुः किञ्चन पार्थिवाः |
८१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरस्य शरीरं तत्तथैव स्तव्धलोचनम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरस्य सुहृत्कश्चित्खनकः कुशलः क्वचित् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरस्यापि ते वाक्यं श्रुतं भीष्मस्य चोभय़ोः |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरस्याश्रवे राजा स च प्रत्याह सञ्ज्ञय़ा ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरस्यैव वचनात्खनित्री विहिता ततः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
विदुरा नाम वै सत्या जगर्हे पुत्रमौरसम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
विदुरागमनं पर्व राज्यलम्भस्तथैव च ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरादय़श्च तामार्तां कुन्तीमाश्वास्य हेतुभिः |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरादय़श्च ते सर्वे रुरुदुर्दुःखिता भृशम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरान्नानि वुभुजे शुचीनि गुणवन्ति च ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरावसथं रम्यमुपातिष्ठत माधवः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
विदुराय़ च धर्मात्मा पूजां चक्रे यतव्रतः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०६
वैशम्पाय़न उवाच
विदुराय़ च वै पाण्डुः प्रेषय़ामास तद्धनम् |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
विदुराय़ा वचोभिस्त्वमस्मान्न त्यक्तुमर्हसि ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
विदुराय़ाः प्रलापैस्तैः प्लावनार्थं तु तत्कृतम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
विदुराय़ाश्च संवादं पुत्रस्य च परन्तप ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
जनमेजय़ उवाच
विदुरे चापि संसिद्धे धर्मराजं व्यपाश्रिते |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
युधिष्ठिर उवाच
विदुरे सञ्जय़े चैव कोऽन्यो मां वक्तुमर्हति ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरेण महातेजास्तथैव च युय़ुत्सुना ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरेण सहासीनं व्राह्मणैश्च सहस्रशः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६
द्रुपद उवाच
विदुरेणानुनीतोऽपि पुत्रमेवानुवर्तते ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरेणैवमुक्तस्तु धृतराष्ट्रो जनाधिपः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरेणैवमुक्ते तु केशवः शत्रुपूगहा |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरेणैवमुक्ते तु केशवो वाक्यमव्रवीत् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरो द्रोणपुत्रश्च वैश्यापुत्रश्च वीर्यवान् ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरो धर्मराजस्य तेजसा प्रज्वलन्निव ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरो धृतराष्ट्रश्च लेभाते परमां मुदम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरो धृतराष्ट्रश्च सर्वाश्च भरतस्त्रिय़ः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरो धृतराष्ट्राय़ गान्धार्यै पाण्डवारणिः |
३३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरो भूय़ एवाह वुद्धिपूर्वं परन्तप ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरो मणिपीठे तु शुक्लस्पर्ध्याजिनोत्तरे |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
विदुरो यत्र वाक्यानि विचित्राणि हितानि च |
१४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
विदुरो वा तथा क्षत्ता कुन्ती वापि यशस्विनी |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरो वापि मेधावी कुरूणां प्रवरो मतः |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरो वृक्षमाश्रित्य कञ्चित्तत्र वनान्तरे ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
विदुरोऽहं महाप्राज्ञ सम्प्राप्तस्तव शासनात् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
द्वाःस्थ उवाच
विदुरोऽय़मनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
विदुर्यं कपिलं देवं येनात्ताः सगरात्मजाः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
विदुलस्येव तत्पुष्पं मोघं जनय़ितुः स्मृतम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
विदुषां वुध्यमानानां स्वं स्वं स्थानं यथाविधि |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
विदुस्ते वीर कर्माणि नानवाप्तानि कानिचित् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
विदुस्त्वां निधनं पार्थ सर्वक्षत्रस्य तद्विदः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
विदुस्त्वां सर्वभूतानि पार्थ भूतहिते रतम् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
विदूरजाताश्च लताः समाश्लिष्यन्त पादपान् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
विदूरपातात्तोय़स्य किं पुनः कर्ण वाय़सः ||
४२ ग