कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
हस्तिदन्तान्त्सरून्खड्गान्ध्वजाञ्शक्तीर्हय़ान्गजान् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
हस्तिनं हस्तिय़न्तारमश्वमाश्विकमेव च |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
हस्तिनश्चैव सुमहान्भीतस्य रुवतो ध्वनिः ||
५९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
हस्तिनां च निनादेन कम्पय़न्वसुधामिमाम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
हस्तिनां व्रजमासाद्य रथदुर्गं प्रविश्य च |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
हस्तिनामय़ुतं हत्वा जघानाश्वाय़ुतं पुनः ||
८५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
हस्तिनासाः कूर्मनासा वृकनासास्तथापरे |
९४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तिर्नावो विष्टिस्तथैव च |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
हस्तिनोऽश्वांश्च गाश्चैव दास्यो वहुशतास्तथा |
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
हस्तिनोऽश्वाश्च गावश्चाप्युष्ट्राश्वतरगर्दभाः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
हस्तिपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु चैव ह |
१३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
हस्तिभद्रः पिठरको मुखरः कोणवासनः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
हस्तिभिः पतितैर्भिन्नैस्तव सैन्यमदृश्यत |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
हस्तिभिः पतितैश्चैव तुरगैश्चाभवन्मही |
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
हस्तिभिर्मृदिताः केचित्क्षुण्णाश्चान्ये तुरङ्गमैः ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
हस्तिभिस्तु महामात्रास्तव पुत्रेण चोदिताः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
हस्तिवद्धस्तिसङ्काशमभिदुद्राव ते सुतम् ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
हस्तिशिक्षाविदश्चैव सर्वे चैवाग्निय़ोनय़ः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
हस्तिशिक्षासु तत्त्वज्ञमहङ्कारविवर्जितम् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
हस्तिसूत्राश्वसूत्राणि रथसूत्राणि चाभिभो ||
१०९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
हस्तिहस्तगतः खड्गः स्फ्यो भवेत्तस्य संय़ुगे ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
हस्तिहस्तपरिक्लिष्टां व्याकुलामिव पद्मिनीम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
हस्तिहस्तान्हय़ग्रीवा रथाक्षांश्च समन्ततः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
हस्तिहस्तान्हय़ग्रीवान्वाहूनपि च साय़ुधान् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
हस्तिहस्तोपमं शैक्षं सर्वशत्रुनिवर्हणम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
हस्तिहस्तोपमांश्चोरूञ्शरैरुर्व्यामपातय़त् ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
हस्तिहस्तोपमानूरून्हस्तान्पादांश्च भारत ||
१०९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
हस्तिहस्तोपमैरन्यैः संवृतं तद्रणाङ्गणम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
हस्तिहस्तोपमैश्चापि भुजगाभोगसंनिभैः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
हस्तिहस्तोपमैश्छिन्नैरूरुभिश्च तरस्विनाम् ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
हस्तिहस्तोपमैश्छिन्नैरूरुभिश्च तरस्विनाम् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
हस्तिय़न्ता गजस्येव शिर एवारुरुक्षति ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
हस्ती खलु त्रैगर्तीमुपय़ेमे यशोधरां नाम |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
हस्ती वितर्कः क्राथश्च कुण्डलश्चापि पञ्चमः |
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
हस्ती श्वेत इवाज्ञातः कथं जिष्णुश्चरिष्यति ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
हस्तीव त्वं जनक वितुद्यमानो; न मामिकां वाचमिमां शृणोषि ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
हस्ते कर्णस्तदा पार्थमभ्यविध्यच्च सप्तभिः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
हस्ते गृहीत्वा तां कन्यामथैनं वासवोऽव्रवीत् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
उमो उवाच
हस्ते चैतत्पिनाकं ते सततं केन तिष्ठति |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
हस्ते हस्तिरथं दत्त्वा चतुर्युक्तमुपोषितः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
हस्तैराक्षिप्य ममृदुः पद्भिश्चाप्यतिमन्यवः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
हस्तैर्विचेरुस्ते नागा वभञ्जुश्चापरे तथा ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपिंषन्नराधिपाः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपीषन्नमर्षिताः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
हस्तो हस्तं परिमुषेद्युगान्ते पर्युपस्थिते ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
हस्तो हस्तं स मुष्णीय़ाद्भिद्येरन्सर्वसेतवः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
हस्तौ कर्मेन्द्रिय़ं ज्ञेय़मथ पादौ गतीन्द्रिय़म् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
हस्त्यङ्गान्यथ कर्णाय़ प्राहिणोत्पाण्डवो नदन् ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
हस्त्यनीकान्यतिष्ठन्त तथानीकानि वाजिनाम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
हस्त्यश्वखरशार्दूले सवृक्षे गवि चैव ह |
३२ क