chevron_left  हस्त्यश्वनरदेहांश्चarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
हस्त्यश्वनरदेहांश्च गतासून्प्रेक्ष्य सर्वतः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
हस्त्यश्वरथघोषेण नादय़न्तो वसुन्धराम् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
हस्त्यश्वरथपत्तीनां व्रातान्निघ्नन्तमर्जुनम् |
१०३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
हस्त्यश्वरथपत्तीनां शस्त्राणां च ततस्ततः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
हस्त्यश्वरथपत्त्यौघाः परिवव्रुरुदाय़ुधाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २३६
वैशम्पाय़न उवाच
हस्त्यश्वरथपादातं यथास्थानं न्यवेशय़त् ||
७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
हस्त्यश्वरथपूर्णेन पताकाध्वजमालिना ||
१ ग
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
हस्त्यश्वरथरत्नैश्च गोभिरुष्ट्रैरथाविकैः |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
हस्त्यश्वरथसङ्कीर्णं नरनारीसमाकुलम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
हस्त्यश्वरथसम्पन्नं त्रिभिरङ्गैर्महत्तरम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
हस्त्यश्वरथसम्पन्ने वर्चस्वी जाय़ते कुले ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
हस्त्यश्वरथसम्पूर्णा मनुष्यकलिला भृशम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
हस्त्यश्वरथसम्वाधं यच्चानीकं विलोक्यते |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
हस्त्यश्ववहुले राजन्प्रेक्षणीय़े वभूवतुः ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
हस्त्यारोहा रथारोहान्रथिनश्चापि सादिनः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
हस्त्यारोहा रथिनः सादिनश्च; पदातय़श्चार्यसङ्घा महान्तः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
हस्त्यारोहैरुपेतानां सहस्रं साहसप्रिय़ः ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
हा कर्ण इति चाक्रन्दन्कालोऽय़मिति चाव्रुवन् ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
हा कर्ण हा कर्ण इति व्रुवाण; आर्तो विसञ्ज्ञो भृशमश्रुनेत्रः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
हा कर्ण हा कर्ण इति शोचमानः पुनः पुनः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
हा कष्टमिति चोक्त्वा स ततो वचनमाददे ||
२८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
हा तात धर्मराजेति समाक्रन्दन्महाभय़े ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
हा तात हा पुत्र सखे क्वासि तिष्ठ क्व धावसि ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
हा तात हा सुतेत्येवं तदा वाचः सुदारुणाः |
८४ क
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
हा तात हा सुतेत्येवं तास्ता वाचः सुदारुणाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
हा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनाथवत् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
हा नाथ हा धर्म इति व्रुवन्तो; ह्रिय़ा च सर्वेऽश्रुमुखा वभूवुः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
हा नाथ हा महाराज हा स्वामिन्किं जहासि माम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
हा पुत्र इति निःश्वस्य व्यथितो न्यपतद्भुवि ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
हा पुत्र मम मन्दाय़ाः कथं संय़ुगमेत्य ह |
२ क
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
हा पुत्र हा साध्वि वधूः क्वासि क्वासीत्यरोदताम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
हा पुत्रकावितृप्तस्य सततं पुत्रदर्शने |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
हा वीर कुरुराजेति हा भीमेति च नर्दताम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
हा वीर दृष्टो नष्टश्च धनं स्वप्न इवासि मे |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
हा वीर ननु नामाहमिष्टा किल तवानघ |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
हा शक्रेति तदा देवी विललाप सुदुःखिता ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
हा सीते लक्ष्मणेत्येवं चुक्रोशार्तस्वरेण ह ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १२८
लोमश उवाच
हा हताः स्मेति वाशन्त्यस्तीव्रशोकसमन्विताः |
३ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
हा हतास्मि कुतो न्वद्य भवेच्छान्तिरिहानलात् |
८० क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
हा हतास्मि विनष्टास्मि भीतास्मि विजने वने ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
हा हते हा हतेत्येव स्वामिभर्तृहतेति च |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
हा हा गच्छन्ति नो नाथाः समवेक्षध्वमीदृशम् |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
हा हा पुत्रेति शोकार्ता विललापाकुलेन्द्रिय़ा ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
हा हा भीमेति चुक्रोश भूय़ः शोकसमन्वितः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
हा हा राजन्निति मुहुरितश्चेतश्च धावति ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
हा हा विनिहतो भीमः कुञ्जरेणेति मारिष ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
हा हेति तुमुलः शव्दो भूतानां समपद्यत |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
हा हेति दिवि देवानां पार्थिवानां च सर्वशः |
८२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
हा हेति सहसा शव्दः पाण्डूनां समजाय़त ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
हाटकस्याभिरूपस्य भारोऽय़ं सुमहान्मय़ा |
२८ ख