द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
हतं तं संय़ुगे कश्चिदाख्यात्वस्मै मृषा नरः ||
१११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
धृतराष्ट्र उवाच
हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संय़ुगे |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संय़ुगे |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संय़ुगे |
८ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
हतं दृष्ट्वा तु शैनेय़ं पुत्रं च यदुनन्दनः |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
हतं दृष्ट्वा नरव्याघ्रं राधेय़मभिमानिनम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
हतं दृष्ट्वा महाकाय़ं वकज्ञातिमरिन्दमम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
हतं देवव्रतं श्रुत्वा पाञ्चाल्येन शिखण्डिना ||
१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
हतं पञ्चशतं तेषां सहस्रं वाहुशालिनाम् |
११ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
हतं पतिमुपासन्तीं द्रोणं शस्त्रभृतां वरम् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
हतं पराङ्मुखप्राय़ं निरुत्साहं परं वलम् |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
हतं पुत्रशतं शूरं सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनम् |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
हतं पुत्रशतं श्रुत्वा यन्न दीर्णं सहस्रधा ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
हतं पुत्रशतं सद्यस्तपसा प्रपितामह ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
हतं प्रविहतं वाणैः सर्वतः प्रद्रुतं दिशः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
हतं भीष्ममाधिरथिर्विदित्वा; भिन्नां नावमिवात्यगाधे कुरूणाम् |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
हतं मेने जरासन्धं दृष्ट्वा भीमपुरोगमौ |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
हतं मय़ाद्य शंसेथा धृष्टद्युम्नं नराधिप ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
हतं रुक्मरथं दृष्ट्वा प्राद्रवत्सहितो रथैः ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
हतं वाप्यहतं वाजौ त्वां पिता पुत्रवत्सलः ||
११४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
हतं वैकर्तनं श्रुत्वा द्वैरथे सव्यसाचिना |
८७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
हतं वैकर्तनं श्रुत्वा शोको मर्माणि कृन्तति ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
हतं शंससि भीष्मं मे किं नु दुःखमतः परम् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
हतं शान्तनवं श्रुत्वा मन्ये शेषं वलं हतम् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
हतं शिखण्डिना श्रुत्वा यन्न दीर्यति मे मनः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
हतं श्रुताय़ुधं दृष्ट्वा काम्वोजं च सुदक्षिणम् ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
हतं श्रुत्वा महावाहो मय़ा श्रौतश्रवं नृपम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
हतं सङ्ग्रामे सहदेवेन पापं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
हतं स्म मेनिरे सर्वे तावकास्तं विशां पते ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
हतं स्वमात्मजं दृष्ट्वा विराटः प्राद्रवद्भय़ात् |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
हतं स्वहय़मुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रवद्भय़ात् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
हतं हन्ति हतो ह्येव यो नरो हन्ति कञ्चन |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
हतः शान्तनवो राजन्दुराधर्षः प्रतापवान् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
हतः शूरसुतो व्यक्तं व्यक्तं ते च परासवः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
हतः स इति च श्रुत्वा नैव धैर्यादकम्पत ||
७५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
हतः सौभपतिः शाल्वस्त्वय़ा सौभं च पातितम् ||
२९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
हतज्ञातिर्हतामात्यो हतपुत्रो वनेचरः |
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
हतत्विट्कान्यलक्ष्यन्त निसर्गाद्दैवकारितात् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
हतधुर्या रथाः केचिद्धतसूतास्तथापरे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
हतनागमहानक्रा परलोकवहाशिवा |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
हतपत्यो हतसुता हतवन्धुजनप्रिय़ाः ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
हतपुत्रस्य सङ्ग्रामे दानानि ददतः सदा |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
हतपुत्रा रणे वालाः परिधावन्ति मे स्नुषाः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
हतपुत्रा हतवला हतमित्रा मय़ा सह |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
हतपुत्रा हि गान्धारी निहतज्ञातिवान्धवा |
३३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
हतपुत्रां तु शोचामि गान्धारीं पितरं च ते |
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
हतपुत्राविमौ वृद्धौ विदित्वा दुःखितौ तथा |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
हतपुत्रो हतामात्यो हतसर्वसुहृज्जनः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
हतप्रधानं त्विदमार्तरूपं; परैर्हतोत्साहमनाथमद्य वै |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
हतप्रवीरं विध्वस्तं किञ्चिच्छेषं स्वकं वलम् |
१०७ ख