शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
हानिभङ्गविकल्पानां नवानां संश्रय़ेण च |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
हानेन धर्मस्य महीमपीमां; लव्ध्वा नरः सीदति पापवुद्धिः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
हारहूणांश्च चीनांश्च तुखारान्सैन्धवांस्तथा |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
हाराणामथ निष्काणां तनुत्राणां च भारत |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
हारिद्रवर्णस्तु प्रजाविसर्गा; न्सहस्रशस्तिष्ठति सञ्चरन्वै |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
हारिद्रवर्णा ये त्वेते हेमपुङ्खाः शिलाशिताः |
५० क
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
हारिद्रवर्णाः सुनसाः पीताः सर्वाय़साः शराः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
युधिष्ठिर उवाच
हारिद्रवर्णे रक्ते वा वर्तमानस्तु पार्थिव |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
हारिद्रसमवर्णास्तु जवना हेममालिनः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
हारीतः स्थूणकर्णश्च अग्निवेश्योऽथ शौनकः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
हारैः किरीटैर्मुकुटैरुष्णीषैः किङ्किणीगणैः ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
हारैर्निष्कैः सकेय़ूरैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
हार्दं भय़ं सम्भवति स्वर्गश्चास्य विरुध्यते ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
हार्दं यत्पाण्डवेष्वासीत्प्राप्तेऽस्मिन्नाय़ुषः क्षय़े |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यं छादय़ामास शरैः संनतपर्वभिः ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यं तु महेष्वासमर्जुनः शत्रुपूगहा |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यं दशभिर्वाणैः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे ||
७४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यं दशभिर्वाणैर्वाह्वोरुरसि चार्पय़त् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यं पूजय़ामासुर्वासांस्यादुधुवुश्च ह ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यं योधवर्यं च प्राप्तं मन्ये धनञ्जय़म् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
हार्दिक्यः कृतवर्मा च ये चान्ये नानुकीर्तिताः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यः समरेऽतिष्ठद्विधूम इव पावकः ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यः सात्यकिश्चैव सिंहाविव मदोत्कटौ ||
६९ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
हार्दिक्यतनय़ं पार्थो नगरं मार्तिकावतम् |
६७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यमकरान्मुक्तं तीर्णं वै सैन्यसागरम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यशरसञ्छिन्नं कवचं तन्महात्मनः |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यशरसन्तप्तं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ||
७५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यस्त्वरितो राजन्प्रत्यगृह्णादभीतवत् ||
६८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यस्य धनुश्छित्त्वा ध्वजं चाश्वं तथावधीत् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यो दक्षिणं चक्रं शल्यश्चैवोत्तरं तथा ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यो वारय़ामास रक्षन्भीष्मस्य जीवितम् ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यो वारय़ामास स्मय़न्निव मुहुर्मुहुः ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यो वाह्लिकश्चैव सात्यकिं समभिद्रुतौ |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
हार्योऽय़ं विषय़ो व्रह्मन्गान्धर्वो नाम नामतः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
हावमाभरणं वेषं गतिं स्थितिमवेक्षितुम् |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
हासैश्च हरिणाक्षीणां प्रसुप्तः प्रतिवोध्यते ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
हास्यवस्तुषु चाप्यस्य वर्तमानेषु केषुचित् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
हाहा पुत्रेति कौसल्या पपात सहसा भुवि ||
२३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारं च कुर्वाणाः पृथिव्यां शेरते परे |
९८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारं भृशं चक्रुरहो धिगिति चाव्रुवन् |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारं विकुर्वाणाः कुरवो विप्रदुद्रुवुः ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
हाहाकारः समभवत्तत्र तत्र सहस्रशः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारकृतोत्साहा भीष्मं जग्मुः समन्ततः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारमकुर्वन्त सैन्यानि भरतर्षभ ||
२६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारमभूत्सर्वं निर्मर्यादमवर्तत ||
२० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
हाहाकाररवांश्चैव सिंहनादांश्च पुष्कलान् |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारविनादिन्यो विनिघ्नन्त्य उरांसि च |
६७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारश्च सञ्जज्ञे तव सैन्यस्य मारिष |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारश्च सञ्जज्ञे पाण्डवानां महात्मनाम् ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारस्ततस्तीव्रः सम्वभूव जनेश्वर |
१६ क